नेपाल में महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि पर पहुंचना आज भी डेढ़ी खीर

नेपाल में महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि पर पहुंचना आज भी डेढ़ी खीर
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काठमांडू। बिहार के पश्चिम चंपारण के वाल्मीकि नगर से सटे नेपाल के चितवन जिला स्थित धार्मिक तीर्थस्थल वाल्मीकि आश्रम तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है। इस क्षेत्रको महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि माना जाता है।रामायण में उल्लेख है कि इसी क्षेत्र में अग्निपरीक्षा के बाद सीता को वनवास भेज दिया गया था। यहीं लव और कुश का जन्म हुआ। उनका पालन-पोषण हुआ और उन्होंने महर्षि वाल्मीकि से शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की।

रामायण में वर्णित कथा के अनुसार, अयोध्या से भगवान राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ के दौरान छोड़े गए घोड़े को बाल्यावस्था में ही लव और कुश ने पकड़कर इसी स्थान पर रोक लिया था।

सन् 1964 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में आयोजित धर्म संसद में यह निर्णय लिया गया था कि जिस स्थान पर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की तथा सीता को त्यागे जाने के बाद लव-कुश का जन्म हुआ, वह तमसा नदी के किनारे स्थित वाल्मीकि आश्रम नेपाल में ही है। भारत ने गंडक बैराज की डीपीआर में भी संशोधन कर वाल्मीकि आश्रम को नेपाल की सीमा के भीतर दर्शाया था।भगवान राम से जुड़े होने के कारण हिंदू धर्मावलंबी वाल्मीकि आश्रम को एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मानते हैं। यहां राम, सीता, वाल्मीकि, लव-कुश और हरिहर की मूर्तियों तथा प्रतिमाओं वाले मंदिर बनाए गए हैं। मुख्य मंदिर में स्थापित हरिहर की अष्टधातु की मूर्ति को विशेष महत्व दिया जाता है।

मंदिर के पुजारी रामशरण गिरी के अनुसार, राजा महेंद्र ने विक्रम संवत २०२२ में वाल्मीकि आश्रम में खुदाई करवाते समय यह मूर्ति प्राप्त की थी। विक्रम संवत २०२८ में तत्कालीन सरकार ने हरिहर की इसी मूर्ति की तस्वीर वाला डाक टिकट भी जारी किया था।

पुजारी गिरी के अनुसार, राजा महेंद्र ने ही यहां आकर्षक मंदिर का निर्माण करवाया, मूर्ति की स्थापना कराई और पुजारी की व्यवस्था के साथ कुछ परिवारों को यहां लाकर बसाया था। उन्होंने कहा, “आज भी आश्रम परिसर में 14 परिवार रह रहे हैं।” प्राचीन और धार्मिक धरोहर होने तथा यहां एक दर्जन से अधिक परिवारों के रहने के बावजूद इस आश्रम तक पहुंचना आसान नहीं है।हालांकि वाल्मीकि आश्रम चितवन के माडी क्षेत्र में आता है, लेकिन यह पूर्वी नवलपरासी के त्रिवेणी से अधिक नजदीक है। त्रिवेणी में नारायणी नदी पार करने के बाद करीब ढाई किलोमीटर की दूरी पर आश्रम पहुंचा जा सकता है।

एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के निकट होने के बावजूद आसान मार्ग नहीं होने के कारण यह क्षेत्र लंबे समय से उपेक्षित था। इसी समस्या को देखते हुए करीब चार वर्ष पहले नारायणी नदी पर पुल का निर्माण किया गया था। नए साल, माघ संक्रांति से माघ अमावस्या तक, महाशिवरात्रि और बड़ी एकादशी सहित विभिन्न पर्वों के अवसर पर बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु वाल्मीकि आश्रम पहुंचना चाहते हैं।

anand prakash

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