कलश स्थापना के साथ शुरू हुआ शारदीय नवरात्र

कलश स्थापना के साथ शुरू हुआ शारदीय नवरात्र
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मोतिहारी।आश्विन मास की प्रतिपदा यानी 22 सितंबर को कलश स्थापना के साथ शारदीय नवरात्रि शुरू हो गये।आचार्य धुरेन्द्र तिवारी के अनुसार इस वर्ष देवी दुर्गा का आगमन हाथी पर हो रहा है, जो सुख-समृद्धि, राष्ट्र उन्नति और कल्याण का प्रतीक है। इसके अलावा इस तिथि पर उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और हस्त नक्षत्र योग का संयोग बन रहा है।आचार्य धुरेन्द्र तिवारी बताते है,कि पंचांग के अनुसार, इस वर्ष नवरात्रि में किसी भी तिथि का क्षय नहीं हो रहा है, बल्कि वृद्धि हो रही है। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि का पर्व नौ की बजाय पूरे दस दिनों का है, जो एक दुर्लभ और शुभ संयोग माना जा रहा है। ज्योतिष पंचांग के अनुसार, ऐसा ‘वृद्धि तिथि’ के कारण हो रहा है। इस बार तृतीया तिथि का व्रत 24 और 25 सितंबर को रखा जाएगा। दरअसल तृतीया तिथि दो दिन रहेगी, जिससे शारदीय नवरात्रि में एक दिन की वृद्धि होगी। देवी की उपासना के लिए एक अतिरिक्त दिन का मिलना अत्यंत मंगलकारी माना जा रहा है,जिससे भक्तों को साधना के लिए अधिक समय प्राप्त होगा।

नवरात्रि व्रत के महत्व

आचार्य बताते है,कि नवरात्रि का व्रत केवल निराहार रहना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुशासन है। इन दिनों में सात्विक भोजन (फलाहार, सेंधा नमक) ही ग्रहण करें। लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा से पूरी तरह दूर रहें। व्रत के दौरान क्रोध, असत्य, और निंदा से बचें। ब्रह्मचर्य का पालन करें और अपनी ऊर्जा को भक्ति में लगाएं। प्रतिदिन सुबह-शाम मां दुर्गा की आरती और मंत्रों का जाप अवश्य करें। इन नियमों का पालन करने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

शारदीय नवरात्रि 2025 कैलेंडर

22 सितंबर 2025 – प्रतिपदा (शैलपुत्री पूजा)
23 सितंबर 2025 – द्वितीया (ब्रह्मचारिणी पूजा)
24 सितंबर 2025 – तृतीया (चन्द्रघण्टा पूजा)
26 सितंबर 2025 – चतुर्थी (कूष्माण्डा पूजा)
27 सितंबर 2025 – पञ्चमी (स्कन्दमाता पूजा)
28 सितंबर 2025 – महाषष्ठी (कात्यायनी पूजा)
29 सितंबर 2025 – महासप्तमी (कालरात्रि पूजा)
30 सितंबर 2025 – महाअष्टमी (महागौरी पूजा)
1 अक्टूबर 2025 – महानवमी (सिद्धिदात्री पूजा)
2 अक्टूबर 2025 – विजयादशमी
ऐसी मान्यता है,कि नवरात्र में शक्ति की साधना, पूजा और अर्चना की जाए तो प्रकृति शक्ति के रूप में कृपा करती है और भक्तों के मनोरथ पूरे होते हैं। नवरात्र शक्ति महापर्व वर्ष में चैत्र व अश्विन नवरात्र के रूप में ही मनाया जाता है। जिसमे भक्त जप,ध्यान से माता के आशीर्वाद से अपनी साधना को सिद्धि में बदलते है।नवरात्र पर्व का वैज्ञानिक महत्व भी है। वर्ष के दोनों प्रमुख नवरात्र प्रायः ऋतु संधिकाल में अर्थात् दो ऋतुओं के सम्मिलिन में मनाए जाते हैं। जब ऋतुओं का सम्मिलन होता है तो प्रायः शरीर में वात, पित्त, कफ का समायोजन घटता बढ़ता है। परिणामस्वरूप रोग प्रतिरोध क्षमता कम हो जाती है।ऐसे में जब नौ दिन जप, उपवास, साफ-सफाई, शारीरिक शुद्धि, ध्यान, हवन आदि किया जाता है तो वातावरण शुद्ध हो जाता है।

anand prakash

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