आर्य समाज के शताब्दी समारोह में यज्ञोपवीत एवं यज्ञ का आयोजन
– मधुर भजनों ने बांधा समां
रक्सौल। आर्य समाज रक्सौल के शताब्दी समारोह एवं 51 कुण्डीय वैदिक महायज्ञ के दूसरे दिन रविवार को श्रद्धा, भक्ति और वैदिक परंपरा की झलक देखने को मिली। इस अवसर पर आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री एवं बहन अलका आर्या की देखरेख में यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ के मुख्य यजमान ओमप्रकाश गुप्ता एवं आशा देवी बने, जिन्होंने वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच अग्निहोत्र में आहुति देकर धर्म, संस्कृति और समाज उत्थान की कामना की। आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को यज्ञ का महत्व विस्तार से समझाते हुए कहा कि यज्ञ संसार का श्रेष्ठतम कर्म है, जिसे करने का सामर्थ्य केवल मनुष्य में है और यह वही पुण्य कार्य है जिससे न केवल आत्मिक शांति मिलती है बल्कि समाज और प्रकृति भी संतुलित रहती है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यज्ञोपवीत धारण किए बिना यज्ञ करना शास्त्रसम्मत नहीं है और यह अधिकार पुरुष और स्त्री दोनों को समान रूप से प्राप्त है, इसलिए समाज को इस सच्चाई को आत्मसात करना चाहिए। वहीं, बहन अलका आर्या ने अपने मधुर भजनों से उपस्थित श्रद्धालुओं का दिल जीत लिया और वातावरण को भक्ति रस से सराबोर कर दिया। कार्यक्रम में सहयोग एवं सक्रिय भागीदारी देने वालों में प्रो. रामाशंकर प्रसाद, ओमप्रकाश गुप्ता, ईश्वर दत्त आर्य, मनोज आर्य, ईश्वर चंद्र आर्य, गुलशन आर्य, हरिलाल ठाकुर, पं. राजीव शास्त्री, ज्ञान चंद आर्य सहित अनेक कार्यकर्ताओं की भूमिका सराहनीय रही। महायज्ञ स्थल पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहा, लोगों ने यज्ञ के महत्व को समझा, मंत्रों की ध्वनि में आस्था की गूंज सुनाई दी और भक्तिभाव से परिपूर्ण माहौल ने सभी को भाव-विभोर कर दिया। कार्यक्रम की संध्या सत्र में शाम 6ः30 बजे से रात 10ः30 बजे तक भजन और प्रवचन का आयोजन किया गया, जिसमें विद्वान वक्ताओं और भजन गायक मंडलियों ने आर्य समाज के सिद्धांतों और वैदिक परंपरा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए समाज को आदर्श जीवन जीने का संदेश दिया। आर्य समाज के इस शताब्दी पर्व में जहां एक ओर यज्ञ और भजन-प्रवचन की श्रृंखला से श्रद्धा और आस्था का संचार हुआ, वहीं दूसरी ओर वैदिक मूल्यों की पुनर्स्थापना और समाज में समानता, शिक्षा एवं जागरूकता का संदेश भी प्रसारित हुआ। इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने इसे जीवन का एक अविस्मरणीय अनुभव बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं, जो समाज को एक सूत्र में पिरोते हैं और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं।

