महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ
मोतिहारी। महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा “भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और सुशासन : कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं मानवीय दृष्टिकोण” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारम्भ हुआ।
इस सम्मेलन का उद्देश्य वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा, सुशासन तथा मानवीय मूल्यों की भूमिका पर गंभीर विमर्श करना है। सम्मेलन में देश-विदेश के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, नीति-विशेषज्ञों तथा शोधार्थियों ने भाग लिया और समकालीन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा चुनौतियों तथा तकनीकी परिवर्तन के संदर्भ में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए।
इस सम्मलेन की शुरुआत सामाजिक संकाय के अधिष्ठता प्रोफ़ेसर सुजीत कुमार चौधरी के स्वागत उद्बोधन द्वारा किया गया| सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में इंडिया फाउंडेशन के रिसर्च फेलो डॉ. पवन चौरसिया ने अपने वक्तव्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मानवता की चिंता को प्रमुख विषय के रूप में प्रस्तुत किया।
सम्मेलन के एक अन्य वक्ता के रूप में भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन डॉ रजनीश कुमार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति या तकनीकी साधनों का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सोच और दृष्टिकोण का परिणाम है। उनके अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक महत्वपूर्ण तकनीकी साधन अवश्य है, लेकिन इसमें स्वयं की तार्किक क्षमता या मानवीय संवेदना नहीं होती।
सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रूसी एवं मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर संजय कुमार पांडेय ने अपने विचार रखते हुए भारत की प्राचीन परंपराओं और सुशासन की अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत की शासन व्यवस्था में नैतिकता, न्याय और जनकल्याण को विशेष महत्व दिया जाता था, जो आज भी सुशासन की मूलभूत आधारशिला है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में मानवीय दृष्टिकोण का विशेष महत्व रहा है। वर्तमान समय में वैश्विक राजनीति के स्वरूप में तीव्र परिवर्तन हो रहे हैं और लगभग प्रत्येक दशक में विश्व राजनीति की गतिशीलता नए रूप में सामने आती है। आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर चुके हैं, जहां तकनीकी विकास अंतर्राष्ट्रीय संबंधों, युद्ध रणनीतियों और शासन प्रणालियों को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि हम अपनी सांस्कृतिक और नैतिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए तकनीकी प्रगति का उपयोग करें।
नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर तथा नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के पूर्व सलाहकार एवं इज़राइल में नेपाल के पूर्व राजदूत रहे प्रोफेसर डी. पी. पंडित ने अपने व्याख्यान में भारत-नेपाल कूटनीतिक संबंधों, हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय चिंताओं तथा समकालीन वैश्विक संघर्षों पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंध अत्यंत गहरे हैं और दोनों देशों के बीच सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
इस दो दिवसीय सम्मेलन के प्रथम दिवस के दौरान विभिन्न शैक्षणिक सत्रों में शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सुशासन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, साइबर सुरक्षा तथा क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इन सत्रों में यह विचार सामने आया कि तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण, नैतिक मूल्यों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को भी समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए।
इस अवसर पर चीफ प्रॉक्टर प्रोफेसर प्रसून दत्त के अलावा राजनीति विज्ञान विभाग प्रोफ़ेसर पंकज कुमार सिंह, डॉ. सरिता तिवारी, डॉ. ओम प्रकाश गुप्ता, डॉ. प्रेरणा भादुली और अन्य प्रोफेसर उपस्थित रहे |

