भारतीय ज्ञान परम्परा सम्पूर्ण विश्व में सर्वाधिक प्रासंगिक:कुलपति
पूर्वी चंपारण। महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, की भारतीय ज्ञान परम्परा समिति द्वारा आयोजित “भारतीय ज्ञान परम्परा एवं समकालीन परिप्रेक्ष्य” विषयक सात दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का बुधवार को शुभारंभ हुआ।कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा आज सम्पूर्ण विश्व में सर्वाधिक प्रासंगिक है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को समझने के लिए उसके मूल संदर्भों तथा भारतीय चिंतन परम्परा को जानना अत्यंत आवश्यक है। इस अवसर पर संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. प्रसून दत्त सिंह, प्रो. ब्रजेश पाण्डेय, प्रो. विमलेश कुमार सिंह, प्रो. श्याम कुमार झा, संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ. बबलू पाल तथा डॉ. विश्वजीत वर्मन सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए अतिथिगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। अतिथियों का स्वागत करते प्रो. प्रसून दत्त सिंह ने भारतीय ज्ञान परम्परा को वेदकालीन परम्परा बताते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति ही भारतीय ज्ञान परम्परा का मूल आधार है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का विकास विभिन्न भाषाओं में हुआ है और इसकी जड़ें अत्यंत गहरी हैं। प्रो. ए. के. शरण ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा के विकास के लिए संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में प्रशासन, अर्थव्यवस्था तथा वित्त जैसे विषय भी महत्वपूर्ण अंग हैं।
प्रो. वंदना झा ने भारतीय ज्ञान परम्परा की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए महाकवि विद्यापति की प्रसिद्ध पंक्तियों- “जनम अवधि हम रूप निहारल…” तथा “नंदक नंदन कदंबक तरु तर, धीरे-धीरे मुरली बजाव…” का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा वह परम्परा है जो मनुष्य को पुनर्जीवित करती है और उसे अपने अस्तित्व को समझने की दिशा प्रदान करती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा में कला, संस्कृति और धरोहर की समृद्ध परम्परा समाहित है तथा इसमें पंचमहाभूतों की अवधारणा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रो. प्रमोद कुमार ने कहा कि व्यक्ति का बौद्धिक विकास परम्परा के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने भारतीयता की प्रकृति को समझने को भारतीय ज्ञान परम्परा की मूल आधारशिला बताया। प्रो. परमेंद्र कुमार बाजपेयी, कुलपति, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा ने तत्त्वमीमांसा के प्रमुख बिन्दुओं पर चर्चा करते हुए ब्रह्माण्ड तथा ज्ञान से विज्ञान की ओर अग्रसर होने की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सांख्य दर्शन भारतीय ज्ञान परम्परा का महत्वपूर्ण अंग है। साथ ही उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा को कालखण्डों में विभाजित न करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि ज्ञान मनुष्य को भौतिक जगत में व्यवहार करना सिखाता है और भारतीय ज्ञान परम्परा को समझने के लिए विज्ञान की समझ भी आवश्यक है।
इस सात दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में भारतीय ज्ञान परंपरा समिति, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के सदस्य एवं सप्त दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के सहसंयोजक डॉक्टर श्याम नंदन, डॉ विश्वजीत बर्मन, अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर विमलेश कुमार सिंह, डॉक्टर उमेश पात्रा आदि विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के संकाय सदस्य उपस्थित रहे। संस्कृत तथा अन्य विभागों के लगभग 70 शोधार्थी एवं विद्यार्थी भी उपस्थित रहे। द्वितीय सत्र के मुख्य वक्ता प्रोफेसर कमलेश कुमार सिंह तथा विशिष्ट वक्ता प्रोफेसर वंदना झा, अध्यक्षा- हिन्दी विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की उपस्थिति रही। इस अवसर पर भारतीय ज्ञान परंपरा के जिज्ञासु विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों की संख्या लगभग 50 से अधिक रही।

