नेपाल के मधेस प्रदेश की राजनीति में बड़े उलटफेर की संभावना
-राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की सूनामी की संभावना में क्षेत्रीय दल दिख रहे कमजोर
-कई सीटों पर अप्रत्याशित प्रदर्शन कर रही राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी
रक्सौल/वीरगंज।नेपाल में हाल ही में संपन्न प्रतिनिधि सभा चुनाव के परिणामों ने मधेस की राजनीति की दिशा बदलने के संकेत दिए हैं। शुरुआती नतीजों और रुझानों से स्पष्ट हो रहा है कि इस बार चुनाव में मधेस केंद्रित दलों का प्रभाव काफी कमजोर रहा है। कई राजनीतिक विश्लेषक इसे मधेसवादी दलों के लिए चुनौतीपूर्ण दौर की शुरुआत मान रहे हैं, जबकि राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के अप्रत्याशित प्रदर्शन ने पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को झकझोर कर रख दिया है। चुनावी नतीजों को देखते हुए मधेस क्षेत्र में चर्चा तेज है कि इस बार मधेस आधारित दलों का जनाधार पहले की तुलना में काफी घटा है। लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति पर प्रभाव रखने वाले दल मतदाताओं को एकजुट करने में सफल नहीं हो पाए हैं। मधेस मामलों के जानकार चंद्रकिशोर व कुमार अखिल का कहना है कि वर्तमान स्थिति मधेसवादी दलों के लिए गंभीर संकेत दे रही है। उनके अनुसार, “यदि कोई नेता अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता के दम पर जीत जाता है, तो वह अलग बात है। लेकिन संगठनात्मक शक्ति के आधार पर जीतने की स्थिति फिलहाल किसी भी मधेसवादी दल की नहीं दिख रही।
उन्होंने कहा कि मधेसवादी दलों के लिए यह समय “पतझड़ के मौसम” जैसा है। संघीय सरकार, प्रदेश सरकार और स्थानीय स्तर पर इन दलों का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा, जिसका असर सीधे चुनावी परिणामों में दिखाई दे रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार नई पीढ़ी के आंदोलनों और सामाजिक बदलावों के बावजूद मधेसवादी दल अपनी संगठनात्मक संरचना और टिकट वितरण प्रणाली में अपेक्षित बदलाव नहीं कर पाए। यही कारण है कि वे मतदाताओं में नई ऊर्जा पैदा करने में विफल रहे।
उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) नेपाल, जनमत पार्टी, राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी नेपाल, नागरिक उन्मुक्ति पार्टी नेपाल और तराई-मधेस क्षेत्र के अन्य कई दल मैदान में थे। हालांकि अधिकांश सीटों पर इन दलों की स्थिति अपेक्षा से कमजोर दिखाई दे रही है। सप्तरी निर्वाचन क्षेत्र संख्या–3 को मधेसवादी दलों के लिए संभावित मजबूत सीट माना जा रहा है, जहां जसपा नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव बढ़त बनाए हुए हैं। वहीं पार्टी के संरक्षक महन्थ ठाकुर पहले ही राष्ट्रीय सभा के सदस्य निर्वाचित हो चुके हैं।

दूसरी ओर राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के अध्यक्ष राजेन्द्र महतो सर्लाही–2 में तीसरे स्थान पर चल रहे हैं। जनमत पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सीके राउत सप्तरी–2 में रास्वपा उम्मीदवार के बाद दूसरे स्थान पर हैं, लेकिन उनकी स्थिति भी पहले जैसी मजबूत नहीं दिख रही। तालमेल की कमी भी बनी बड़ी वजह विश्लेषकों का मानना है कि मधेस केंद्रित दलों के बीच मजबूत चुनावी तालमेल नहीं बन पाना भी उनकी कमजोर स्थिति का बड़ा कारण है। इस बार अधिकांश दल अलग-अलग चुनाव लड़ते दिखाई दिए। हालांकि राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी, नागरिक उन्मुक्ति पार्टी नेपाल और जसपा (अशोक राई समूह) ने एक ही चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन इसका खास असर नहीं पड़ा। वहीं रिजवान अंसारी के नेतृत्व वाली नेपाल संघीय समाजवादी पार्टी ने कुछ छोटे दलों के साथ गठबंधन बनाया, पर वह भी प्रभाव नहीं छोड़ सका। दल बदल और समर्थन ने भी बदले समीकरण
चुनाव के दौरान कई नेताओं के दल बदलने और समर्थन बदलने से भी राजनीतिक समीकरण प्रभावित हुए। राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव झा ने पार्टी से इस्तीफा देकर रास्वपा में शामिल होकर धनुषा–3 में रास्वपा उम्मीदवार मनीष झा का समर्थन कर दिया। इसके बाद पार्टी ने उसी सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन किया। इसी तरह सप्तरी–3 में राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के उम्मीदवार गजेन्द्र मंडल ने अपने ही मोर्चे के नेता उपेन्द्र यादव के बजाय कांग्रेस उम्मीदवार दिनेश यादव को समर्थन दे दिया, जिससे मधेसवादी दलों की एकजुटता पर सवाल उठने लगे।
राजनीतिक संकेत राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव ने मधेस की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दिया है। यदि मधेसवादी दल संगठन, नेतृत्व और रणनीति में सुधार नहीं करते, तो आने वाले समय में नई राजनीतिक शक्तियां उनकी जगह ले सकती हैं।

