मुंशी प्रेमचंद जयंती पर मुंशी सिंह महाविद्यालय में ‘गबन’ फिल्म का प्रदर्शन
मोतिहारी। मुंशी सिंह महाविद्यालय, के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की ओर से महान साहित्यकार, कथाकार एवं उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर शुक्रवार को उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘ग़बन’ पर आधारित फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की गई।
स्मार्ट क्लास रूम में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को प्रेमचंद के साहित्य, उनके सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं तथा नैतिक मूल्यों से जोड़ना और साहित्य एवं सिनेमा के अंतर्संबंध को समझने का अवसर प्रदान करना था।
इसका शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एम. एन. हक ने दीप प्रज्ज्वलित एवं मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया। इस अवसर पर प्राचार्य ने कहा कि प्रेमचंद केवल हिंदी साहित्य के महान रचनाकार ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के सजग और संवेदनशील चितेरे थे। उनके साहित्य में तत्कालीन भारतीय समाज की आर्थिक विषमता, सामाजिक रूढ़ियाँ, नैतिक संघर्ष, स्त्री-पुरुष संबंध, मध्यवर्गीय आकांक्षाएं तथा मानवीय संवेदनाएँ अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुई हैं।
उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की रचनाएं समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि बदलते सामाजिक संदर्भों में नए अर्थ और प्रश्न लेकर हमारे सामने उपस्थित होती हैं। विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने साहित्य के माध्यम से सामाजिक संवेदना, मानवीय दृष्टि और नैतिक मूल्यों को विकसित करने का आह्वान किया।
फिल्म प्रदर्शन से पूर्व ‘ग़बन’ उपन्यास और प्रेमचंद के कथा साहित्य के विभिन्न पक्षों पर संक्षिप्त परिचर्चा भी आयोजित की गई। हिंदी विभाग के शिक्षक डॉ. गौरव भारती ने प्रेमचंद के साहित्य में मध्यवर्गीय जीवन, उसकी आकांक्षाओं और सामाजिक दबावों की चर्चा करते हुए कहा कि ‘गबन’ केवल एक व्यक्ति की नैतिक चूक की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक प्रतिष्ठा, उपभोग की आकांक्षा, आर्थिक दबाव और नैतिक मूल्यों के बीच उत्पन्न होने वाले द्वंद्व को सामने लाने वाली महत्वपूर्ण कृति है।
डॉ. शशिकांत यादव ने प्रेमचंद की कथा-दृष्टि, सामाजिक यथार्थ और पात्र-निर्माण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आम आदमी के जीवन और उसकी समस्याओं से गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ है। उन्होंने ‘गबन’ के पात्रों और घटनाओं के माध्यम से उपन्यास में निहित नैतिक द्वंद्व तथा मानवीय कमजोरियों की चर्चा की।
डॉ. अवनीश कुमार मिश्र ने साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंधों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि किसी साहित्यिक कृति को फिल्म के माध्यम से देखना विद्यार्थियों के लिए उसके कथ्य, पात्रों और परिवेश को एक अलग दृष्टि से समझने का अवसर प्रदान करता है। तपश्चात विद्यार्थियों ने ‘ग़बन’ पर आधारित फिल्म का प्रदर्शन देखा।
प्रदर्शन के उपरांत आयोजित परिचर्चा में विद्यार्थियों ने फिल्म के कथानक, पात्रों, अभिनय, सामाजिक संदर्भ तथा उपन्यास से उसके संबंध को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। इस दौरान साहित्य को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखते हुए उसे दृश्य माध्यमों और समकालीन जीवन से जोड़ने की आवश्यकता पर भी विचार-विमर्श हुआ।
कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एम. एन. हक, हिंदी विभाग के शिक्षकगण, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. अवनीश कुमार मिश्र ने किया, जबकि डॉ. शशिकांत यादव ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

