कैग ने मोतिहारी सेंटल यूनिवर्सिटी में बताई कई ‘खामिया’
-8.17 करोड़ कि वित्तीय अनियमितता का मामला गंभीर , टेंडरों में पारदर्शिता नहीं
-सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दो महत्वपूर्ण पद है रिक्त , मुश्किल में व्यवस्था
-चार स्थानों से संचालित होती है एमजीएसयू
मोतिहारी। महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी मोतिहारी के स्थायी कैंपस के निर्माण की लागत सिर्फ छह महीने में 850 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,338.83 करोड़ रुपये हो गई। जिसका कारण डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट को अंतिम रूप देने में देरी है। यह कहना है भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ( सीएजी अर्थात कैग) का।
अपनी नवीनतम ऑडिट रिपोर्ट में कैग ने एमजीसीयू मोतिहारी में कई “खामियों” को उजागर किया है। 1,338 करोड़ के कैंपस में देरी और गायब कागजी रिकॉर्ड से लेकर टेंडर उल्लंघन और इवेंट के बढ़े हुए बिल तक में गड़बड़ियां हुई है। आश्चर्यजनक है कि यूनिवर्सिटी का दो प्रमुख प्रशासनिक पद अभी भी खाली हैं। बताते है कि ऑडिट रिपोर्ट, प्रधान निदेशक लेखापरीक्षा (केंद्रीय) द्वारा, अप्रैल 2023 से मार्च 2025 तक की अवधि की है।
रिपोर्ट में कैंपस निर्माण में 488.83 करोड़ रुपये की लागत वृद्धि के साथ-साथ 8.17 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं और अधिक भुगतान की पहचान की गई है। जबकि प्रस्तावित स्थायी कैंपस बनना बाकी है। वर्तमान में यह मोतिहारी में चार अलग-अलग अस्थायी कैंपों से संचालित हो रहा है।
प्रस्तावित कैंपस पर अनुमानित निर्माण लागत में तेज वृद्धि और कार्यान्वयन में देरी के कारण सवाल उठे हैं। ऑडिट आपत्ति के अनुसार, अनुमानित परियोजना लागत 06 महीनों में लगभग 850 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,338.83 करोड़ रुपये हो गई।अर्थात लगभग 488.83 करोड़ रुपये की वृद्धि आश्चर्यजनक है। यह तेज वृद्धि परियोजना योजना, लागत अनुमान और डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट ( डीपीआर) की मंजूरी प्राप्त करने में देरी पर सवाल खड़े करती है।
डीपीआर एक ऐसा दस्तावेज है जो किसी भी परियोजना के दायरे, डिजाइन, तकनीकी विशिष्टताओं, अनुमानित लागत और समय-सीमा का विवरण देता है। ऑडिट रिकॉर्ड के अनुसार, सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट ने शुरू में निर्माण का अनुमान लगभग 850 करोड़ रुपये का लगाया था और डीपीआर के लिए 1.25 करोड़ रुपये का अनुरोध किया था। एमजीसीयू ने यह राशि 6 फरवरी, 2025 को सीपीडब्लूडी के पास जमा की। हालांकि, जब सीपीडब्लूडी ने 30 मई, 2025 को विश्वविद्यालय को डीपीआर सौंपी, तो 261.83 एकड़ में निर्माण के लिए अनुमानित लागत बढ़कर 1,338.83 करोड़ रुपये हो गई थी।
ऑडिट में कहा गया है कि कई समान कार्यों को छोटे-छोटे अनुबंधों में विभाजित कर दिया गया, जिससे वे ओपन टेंडरिंग के लिए आवश्यक मौद्रिक सीमा से नीचे रहे। रिपोर्ट में कहा गया है, “एक टेंडर में, भाग लेने वाली तीन एजेंसियों में से दो को तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित कर दिया गया। इसको लेकर भी सवाल उठना लाजिमी है । रिपोर्ट में मरम्मत और रखरखाव के काम पर लगभग 86.42 लाख रुपये के अनियमित व्यय के साथ-साथ 3.35 लाख रुपये के अधिक भुगतान को उजागर किया गया है।
ऑडिट में यह भी पाया गया कि कई परियोजनाओं के लिए वर्क ऑर्डर, एग्रीमेंट और कम्प्लीशन सर्टिफिकेट गायब थे , वही कई मेजरमेंट बुक एंट्री और आवश्यक संतुष्टि प्रमाण पत्र अनुपलब्ध थे ।मार्च 2024 के दौरान 10 सेमिनार, वर्कशॉप और कॉन्फ्रेंस कुल 58.45 लाख रुपये की लागत से आयोजित किए गए। हालांकि, एक एकीकृत योजना तैयार नहीं की गई थी, और इवेंट को अलग-अलग प्रस्तुत किया गया था।
ऑडिट ने पांच इवेंट में रिफ्रेशमेंट के लिए बोलीदाता को भुगतान किए गए 9.73 लाख रुपये की पहचान की, जिसमें प्रति-यूनिट दरों में असंगति और खरीद पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए।अब यह भी देखना होगा कि ऑडिट अधिकारियों के रिपोर्ट पर आगे क्या एक्शन होगा।

