बिहार आंदोलन ने बचाया लोकतंत्र, अब उसकी विरासत बचाने की चुनौती

बिहार आंदोलन ने बचाया लोकतंत्र, अब उसकी विरासत बचाने की चुनौती
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-पटना में बिहार आंदोलन और आपातकाल पर आयोजित कार्यक्रम में बोले वक्ता

पटना। बिहार आंदोलन और आपातकाल का इतिहास केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा, जनभागीदारी और सत्ता पर लोकतांत्रिक नियंत्रण का सतत संदेश है। यह बात पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे और वरिष्ठ स्तंभकार एवं बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य डॉ. हरेन्द्र प्रताप ने हिन्दुस्थान समाचार समूह की ओर से आयोजित ‘इमरजेंसी के 50 साल : बिहार आंदोलन और आपातकाल’ विषयक कार्यक्रम में कही।

पटना के मीठापुर इंस्टीट्यूशनल एरिया में बुधवार को आयोजित कार्यक्रम में दोनों वक्ताओं ने बिहार आंदोलन की पृष्ठभूमि, आपातकाल विरोधी संघर्ष तथा वर्तमान समय में लोकतांत्रिक मूल्यों के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर विस्तार से अपने विचार रखे।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि बिहार आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ था, बल्कि इसकी नींव 1973 के पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव और उससे पहले चल रहे छात्र आंदोलनों में पड़ चुकी थी। उन्होंने कहा कि वर्ष 1965-66 से ही कांग्रेस सरकार की नीतियों के खिलाफ असंतोष बढ़ने लगा था और मुजफ्फरपुर छात्र आंदोलन जैसी घटनाओं ने जनता के आक्रोश को और अधिक मुखर बनाया।

उन्होंने बताया कि उस दौर में छात्र नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच लगातार बैठकों का दौर चलता था। रामबहादुर राय, सुशील कुमार मोदी, रविशंकर प्रसाद तथा अन्य छात्र नेताओं ने भ्रष्टाचार, कुशासन और जनसमस्याओं के खिलाफ व्यापक आंदोलन की रणनीति तैयार की। यह आंदोलन धीरे-धीरे छात्र असंतोष की सीमाओं को पार कर सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के अभियान में बदल गया।

चौबे ने कहा कि छात्रों के लगातार आग्रह और जनभावनाओं को देखते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण आंदोलन से जुड़े। पटना विश्वविद्यालय में आयोजित ऐतिहासिक सभा में हजारों छात्रों और युवाओं ने संघर्ष, जेल जाने और आवश्यकता पड़ने पर बलिदान देने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा कि 18 मार्च 1974 को बिहार विधानसभा के घेराव का कार्यक्रम आंदोलन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसी घटना के बाद छात्र आंदोलन एक व्यापक जनांदोलन में परिवर्तित हो गया और पूरे देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन की मांग को नई ऊर्जा मिली।

उन्होंने कहा कि बिहार आंदोलन ने युवाओं को राष्ट्र निर्माण और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संगठित किया तथा आगे चलकर यही आंदोलन आपातकाल विरोधी संघर्ष की मजबूत आधारशिला बना।

वरिष्ठ स्तंभकार एवं पूर्व एमएलसी डॉ. हरेन्द्र प्रताप ने इस मौके पर कहा कि बिहार आंदोलन लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा का जनसंघर्ष था। इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति को यह संदेश दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पर जननियंत्रण और नैतिक जवाबदेही अनिवार्य है।

उन्होंने कहा कि आपातकाल लागू होते ही बड़े राजनीतिक नेताओं की गिरफ्तारी कर ली गई थी, लेकिन इसके बावजूद आंदोलन पूरी तरह नहीं रुका। भूमिगत कार्यकर्ताओं ने संपर्क तंत्र को जीवित रखा और लोकतंत्र की लड़ाई को आगे बढ़ाया। पर्चों के वितरण, गुप्त बैठकों, वैचारिक संवाद और जनजागरण अभियानों के माध्यम से आपातकाल के विरोध का अभियान निरंतर चलता रहा।

डॉ. हरेन्द्र प्रताप ने अपने जेल जीवन के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि जेल जाने वाले कार्यकर्ताओं ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन भूमिगत रहकर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं की चुनौतियां कई मायनों में और अधिक कठिन थीं। उन्हें लगातार गिरफ्तारी, निगरानी और संसाधनों की कमी जैसी परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।

उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन आदर्शों, नैतिक मूल्यों और भ्रष्टाचार विरोधी संकल्पों के साथ बिहार आंदोलन शुरू हुआ था, बाद के वर्षों में उन मूल्यों का कितना पालन किया गया। लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और जवाबदेही से सुनिश्चित होती है।

डॉ. हरेन्द्र ने राजनीति में बढ़ती आर्थिक संपन्नता, सत्ता के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर घटते जनविश्वास को गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि समाज और राजनीतिक नेतृत्व दोनों को इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर होती है तो लोकतंत्र की बुनियाद भी प्रभावित होती है।

दोनों वक्ताओं ने कहा कि बिहार आंदोलन और आपातकाल विरोधी संघर्ष का इतिहास नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान और कानूनों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों, सक्रिय समाज और जवाबदेह नेतृत्व से होती है। इसलिए आपातकाल और बिहार आंदोलन की स्मृतियां लोकतंत्र को मजबूत बनाने की निरंतर प्रेरणा देती रहेंगी।

anand prakash

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