1977 का संघर्ष लोकतंत्र की दूसरी आजादी का आंदोलन था : रामबहादुर राय

1977 का संघर्ष लोकतंत्र की दूसरी आजादी का आंदोलन था : रामबहादुर राय
Facebook WhatsApp

-बिहार आंदोलन को बताया लोकतंत्र बचाने वाले राष्ट्रीय जनआंदोलन की आधारशिला

– कहा, जेपी के राजनीति में लौटने से खड़ा हुआ आपातकाल विरोधी जनसंघर्ष

– 1975-77 के आंदोलन को लोकतंत्र की दूसरी आजादी की लड़ाई बताया

पटना। हिन्दुस्थान समाचार समूह की ओर से पटना के मीठापुर इंस्टीट्यूशनल एरिया में बुधवार को आयोजित ‘आपातकाल के 50 साल : बिहार आंदोलन और आपातकाल’ विषयक कार्यक्रम को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष पद्मश्री रामबहादुर राय ने कहा कि जिस प्रकार 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन देश की राजनीतिक स्वतंत्रता का निर्णायक अध्याय था, उसी प्रकार 1975 से 1977 के बीच चला आपातकाल विरोधी संघर्ष लोकतंत्र की दूसरी आजादी की लड़ाई था।

उन्होंने कहा कि 1947 में देश को विदेशी शासन से मुक्ति मिली थी, जबकि 1977 में भारतीय लोकतंत्र को तानाशाही प्रवृत्तियों से मुक्ति मिली। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दोनों संघर्ष समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

रामबहादुर राय ने कहा कि बिहार आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सक्रिय राजनीति में पुनरागमन था। उन्होंने कहा कि वर्ष 1955 के बाद जयप्रकाश नारायण ने सक्रिय राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया था और वे भूदान आंदोलन तथा रचनात्मक कार्यों में जुट गए थे, लेकिन वर्ष 1974 में उन्होंने बिहार आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया। इसके बाद छात्र आंदोलन एक व्यापक राष्ट्रीय जनआंदोलन में परिवर्तित हो गया और लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष की मजबूत आधारशिला रखी गई।

राय ने कहा कि बिहार आंदोलन को केवल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के रूप में देखना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना होगा। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य ‘संपूर्ण क्रांति’ के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन था। जयप्रकाश नारायण केवल सत्ता परिवर्तन के पक्षधर नहीं थे, बल्कि वे शासन व्यवस्था, राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक संरचना में व्यापक बदलाव चाहते थे।

उन्होंने कहा कि जेपी का चिंतन तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों से कहीं अधिक व्यापक और दूरदर्शी था। इसका प्रमाण यह है कि वर्ष 1959 में ही उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर संविधान और राज्य व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया था। इससे स्पष्ट होता है कि वे देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार के पक्षधर थे।

आपातकाल की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए मीसा के प्रथम बंदी रहे रामबहादुर राय ने कहा कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है कि दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण के भाषण के कारण आपातकाल लगाया गया। उन्होंने कहा कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित किए जाने के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट ने आपातकाल की राह प्रशस्त की। सत्ता में बने रहने की इच्छा और राजनीतिक अस्थिरता की आशंका इसके प्रमुख कारण थे।

उन्होंने कहा कि आपातकाल के कारणों और घटनाक्रम को समझने के लिए शाह आयोग की रिपोर्ट सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है। आयोग की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से बताती है कि किस प्रकार लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किया गया।

रामबहादुर राय ने कहा कि आपातकाल के दौरान हजारों लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं ने जेल यात्राएं कीं और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने इस आंदोलन को दिशा देने और लोकतंत्र समर्थक शक्तियों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि आपातकाल विरोधी संघर्ष केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज के विभिन्न वर्गों, छात्रों, युवाओं, सामाजिक संगठनों और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले नागरिकों का साझा आंदोलन था। इसी व्यापक जनसमर्थन ने तानाशाही प्रवृत्तियों को चुनौती देने का कार्य किया।

रामबहादुर राय ने कहा कि जनवरी 1977 में चुनाव की घोषणा के बाद जनता ने अपने मताधिकार के माध्यम से आपातकाल के विरुद्ध स्पष्ट निर्णय दिया। चुनाव परिणामों ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया और यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय समाज लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गहरी आस्था रखता है।

उन्होंने कहा कि 1977 में लोकतंत्र की हुई पुनर्स्थापना भारतीय जनता की लोकतांत्रिक चेतना, संघर्षशीलता और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यही कारण है कि आपातकाल विरोधी आंदोलन को भारतीय लोकतंत्र की दूसरी आजादी की लड़ाई के रूप में याद किया जाता है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों तथा विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और आपातकाल के अनुभवों से सीख लेने की आवश्यकता पर बल दिया।

anand prakash

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

चोरी करने से बेहतर है खुद की कंटेंट बनाओ! You cannot copy content of this page