ई-रिक्शा में खामियां और रजिस्ट्रेशन में लापरवाही पड़ी महंगी, उपभोक्ता आयोग ने दिलाया 1.90 लाख रुपये का परितोष

ई-रिक्शा में खामियां और रजिस्ट्रेशन में लापरवाही पड़ी महंगी, उपभोक्ता आयोग ने दिलाया 1.90 लाख रुपये का परितोष
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मोतिहारी।जिला उपभोक्ता विवाद परितोष आयोग, मोतिहारी ने सेवा में त्रुटि एवं अनुचित व्यापारिक व्यवहार के एक मामले में अंबिका नगर, चिलवनिया स्थित सदगुरू एंटरप्राइजेज के प्रोपराइटर अमित कुमार पाण्डेय को उपभोक्ता को 1 लाख 90 हजार रुपये परितोष देने का आदेश दिया है। आयोग ने निर्देश दिया है कि यह राशि आदेश की तिथि से दो माह के भीतर भुगतान की जाए। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर 1 मई 2025 से भुगतान की तिथि तक 7 प्रतिशत साधारण ब्याज भी देना होगा।

मामले में तुरकौलिया थाना क्षेत्र के शंकर सरैया बनकट निवासी राजेश कुमार चौधरी ने जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद दायर कर आरोप लगाया था कि उन्होंने 31 जनवरी 2024 को सदगुरू एंटरप्राइजेज से एक ई-रिक्शा खरीदा था। एजेंसी द्वारा ई-रिक्शा की कीमत 1.70 लाख रुपये तथा कागजात तैयार करने के नाम पर 10 हजार रुपये लिए गए थे। विक्रेता ने वाहन का बीमा कराने, बैट्री पर एक वर्ष की गारंटी देने तथा पूर्ण चार्ज होने पर 150 किलोमीटर तक चलने का आश्वासन दिया था।

परिवादी के अनुसार, खरीद के बाद ई-रिक्शा की बैट्री मात्र 90 किलोमीटर तक ही चल पाती थी। वाहन में बार-बार तकनीकी खराबियां आती रहीं और मरम्मत के नाम पर एजेंसी कई-कई सप्ताह तक वाहन अपने पास रखती थी। इतना ही नहीं, जिला परिवहन कार्यालय में आवश्यक दस्तावेज जमा नहीं किए जाने के कारण वाहन का रजिस्ट्रेशन भी नहीं हो सका और न ही उसका बीमा कराया गया। परिवादी ने यह भी आरोप लगाया कि मरम्मत के लिए लिया गया ई-रिक्शा लंबे समय तक एजेंसी के पास रखा गया तथा बाद में एजेंसी ने दूसरे ब्रांड का बोर्ड लगाकर नए ई-रिक्शा का कारोबार शुरू कर दिया।

लगातार शिकायतों के बावजूद समस्या का समाधान नहीं होने पर उन्होंने उपभोक्ता आयोग की शरण ली। मामले की सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष गिरीश मिश्रा एवं सदस्य संजीव कुमार ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन किया। आयोग ने विक्रेता की ओर से सेवा में स्पष्ट त्रुटि पाए जाने पर परिवादी के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए 1.80 लाख रुपये ई-रिक्शा की कीमत एवं रजिस्ट्रेशन शुल्क तथा 10 हजार रुपये शारीरिक-मानसिक कष्ट एवं वाद व्यय के रूप में भुगतान करने का आदेश दिया।

आयोग के इस फैसले को उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे सेवा में लापरवाही बरतने वाले व्यवसायियों को स्पष्ट संदेश मिला है कि उपभोक्ताओं के साथ किए गए वादों का पालन करना उनकी कानूनी जिम्मेदारी है।

anand prakash

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