एमजीसीयू में ‘भारतीय एवं पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र’ पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

एमजीसीयू में ‘भारतीय एवं पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र’ पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
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मोतिहारी।महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (एमजीसीयू) के अंग्रेज़ी विभाग द्वारा ‘भारतीय एवं पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से आए विद्वानों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने साहित्य, कला और सौंदर्यबोध के विविध आयामों पर विचार साझा किए।

कार्यक्रम की शुरुआत संगोष्ठी के संयोजक एवं अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष प्रो. बिमलेश कुमार सिंह के स्वागत वक्तव्य एवं विषय प्रवर्तन से हुई। उन्होंने ऋग्वेद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि सृष्टिकर्ता पूर्ण है और उससे उत्पन्न प्रत्येक वस्तु में सौंदर्य निहित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहित्य में सौंदर्य केवल कथ्य में नहीं बल्कि उसकी अभिव्यक्ति की शैली में निहित होता है। वर्तमान समय को “सौंदर्यबोध के संकट” का दौर बताते हुए उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी उसी सौंदर्य चेतना को पुनर्जीवित करने का प्रयास है।

मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. विकास शर्मा, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ने कहा कि सौंदर्यशास्त्र केवल कला की समझ नहीं बल्कि मानव अनुभव को समझने की प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि भारतीय सौंदर्यशास्त्र जीवन के अनुभवों और आध्यात्मिक चिंतन से विकसित हुआ है, जहाँ उपनिषदों के ‘सत्, चित् और आनंद’ की अवधारणा के माध्यम से सौंदर्य को सत्य और परम आनंद से जोड़ा गया है। इसके विपरीत, पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र अधिकतर दार्शनिक विमर्श के मार्ग से विकसित हुआ। उन्होंने नाटक, नृत्य और काव्य में सौंदर्य के विविध रूपों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।

इसके पश्चात प्रो. भवतोश इंद्र गुरु, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर ने भारतीय सौंदर्यशास्त्र की शाश्वत प्रासंगिकता पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टिकोण में आध्यात्मिक अनुभव और सौंदर्यात्मक अनुभव में कोई भेद नहीं किया गया है—दोनों उत्कृष्टता की एक ही दिशा में अग्रसर होते हैं। उन्होंने अविद्या से विद्या की ओर यात्रा को एक दैवीय आरोहण बताते हुए गीता की दार्शनिक अवधारणाओं का उल्लेख किया। साथ ही आनंदवर्धन, कीट्स और टी.एस. एलियट जैसे विचारकों के उद्धरणों के माध्यम से भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्यिक परंपराओं के बीच सेतु स्थापित किया। उन्होंने प्लेटो और अरस्तू के सौंदर्य सिद्धांतों पर भी प्रकाश डालते हुए उपनिषदों में शब्द और अर्थ की समग्रता की अवधारणा को रेखांकित किया।

संगोष्ठी के मुख्य संरक्षक एवं कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए उच्च शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते प्रभाव पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि तकनीकी सहायता के बावजूद साहित्य, कला और काव्य की सूक्ष्म भावनात्मक गहराइयों को एआई पूर्ण रूप से नहीं समझ सकता। उन्होंने मैकबेथ और कालिदास की कृतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि सौंदर्य की अनुभूति मानव संवेदना से ही संभव है। साथ ही उन्होंने भारत की वैश्विक उभरती भूमिका पर प्रकाश डालते हुए भारतीय संस्कृति और सभ्यता की समृद्ध विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने नाट्यशास्त्र को विश्व सांस्कृतिक संवाद का प्रभावशाली माध्यम बताते हुए अंग्रेज़ी विभाग को इस अकादमिक पहल के लिए बधाई दी और विद्यार्थियों से ऐसे कार्यक्रमों का भरपूर लाभ उठाने का आग्रह किया।

इस संगोष्ठी के आयोजन में डॉ. उमेश पात्रा, डॉ. कल्याणी हज़ारी एवं डॉ. दीपक की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसमें डॉ. उमेश पात्रा ने कार्यक्रम का कुशल संचालन एवं आतिथ्य निभाया।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के डीन, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आगामी सत्रों में गहन अकादमिक विमर्श और विचार-विनिमय के माध्यम से भारतीय एवं पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र की समृद्ध परंपराओं को और अधिक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करेगी।

anand prakash

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