‘समावेशन’ एमजीसीयू के अकादमिक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा:कुलपति

‘समावेशन’ एमजीसीयू के अकादमिक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा:कुलपति
Facebook WhatsApp

-एमजीसीयू में दिव्यांगजनों के भविष्य पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ

पूर्वी चंपारण। महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के सेल फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज (पीडब्लूडी सेल) के तत्वावधान में “भारत में दिव्यांगों का भविष्य” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ विश्वविद्यालय परिसर में में हुआ। यह सम्मेलन समावेशी शिक्षा, गरिमा-केंद्रित विकास तथा दिव्यांगजनों के अधिकारों और सहभागिता को सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अकादमिक एवं सामाजिक पहल के रूप में सामने आया।


उद्घाटन सत्र में मुख्य प्रॉक्टर प्रो. प्रसून दत्त ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि हमें किसी भी व्यक्ति को उसकी शारीरिक सीमाओं के आधार पर नहीं, बल्कि आत्मा के गुणों के आधार पर समझना चाहिए। उन्होंने भारतीय चिंतन और मनीषा का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति दिव्यांगता को दुर्बलता नहीं, बल्कि विशिष्ट सामर्थ्य के रूप में देखती है। “दिव्यांग सहारा” और “दिव्यांग अमर” जैसी अवधारणाएं इसी दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती हैं। इस क्रम में उन्होंने नागेश भट्ट का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि संकल्प और आत्मबल किसी भी सीमा से बड़ा होता है।

सम्मेलन की पृष्ठभूमि और उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए डॉ. दीपक, सदस्य सचिव, सेल फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज, ने कहा कि यह सम्मेलन समावेशन की व्यापक अवधारणा को केंद्र में रखता है। उन्होंने कहा कि किसी न किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति समाज में हाशिए पर होता है और इस सम्मेलन का उद्देश्य सभी प्रकार के वंचित एवं सीमांत समूहों को एक साझा मंच पर लाकर संवाद, सहयोग और समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समावेशन लोकतंत्र, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय की बुनियाद है तथा तकनीक को भी अधिक समावेशी बनाना समय की आवश्यकता है। विकास तभी सार्थक है जब वह गरिमा-केंद्रित हो। सम्मेलन के मुख्य अतिथि प्रो. डी. सी. राय, कुलपति, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय ने कहा कि समावेशन केवल नीति या योजना का विषय नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि समावेशन ही लोकतंत्र की आत्मा है और मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय की वास्तविक अभिव्यक्ति भी। तकनीक और विकास तभी अर्थपूर्ण हैं जब उनका लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक समान रूप से पहुँचे।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय दिव्यांगजनों की आवश्यकताओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील है और विश्वविद्यालय की नीतियाँ समावेशन तथा समान अवसरों के सिद्धांत पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि सेल फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज के माध्यम से विश्वविद्यालय दिव्यांगजनों के हित में निरंतर सकारात्मक और व्यावहारिक हस्तक्षेप कर रहा है। उन्होंने कहा कि दिव्यांग विद्यार्थियों की शैक्षणिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी को और अधिक दिव्यांग-अनुकूल बनाने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, ताकि सभी विद्यार्थियों को अध्ययन और शैक्षणिक संसाधनों तक समान पहुंच मिल सके। उन्होंने दोहराया कि समावेशी और संवेदनशील परिसर का निर्माण विश्वविद्यालय की प्राथमिकताओं में सदैव शामिल रहा है।

कार्यक्रम का कुशल एवं गरिमामय संचालन डॉ. कल्याणी हज़ारी द्वारा किया गया, जबकि डॉ. पाथलोथ ओंकार, सदस्य, सेल फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज, ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों तथा आयोजन से जुड़े सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन विचार-विमर्श, अनुभव-साझाकरण और नीति-निर्देशन के माध्यम से एक अधिक समावेशी, न्यायपूर्ण और गरिमामय समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

anand prakash

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

चोरी करने से बेहतर है खुद की कंटेंट बनाओ! You cannot copy content of this page