नर्सिंगबाबा मंदिर प्रांगण मे हजारों श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़
– नेशनल हाईवे पर बनी रही जाम की स्थिति
डुमरियाघाट। एक इंसान इस कलयुग मे जन्म ले अपनी साधना से कैसे भगवान की उपाधि ले लेता है। इसका जीता जगता उदाहरण नेशनल हाईवे मार्ग 27 के किनारे डुमरियाघाट पुल के समीप समाधि में लीन औघड़ पंथी संत नरसिंह दास है। जो कभी डुमरीयाघाट पुल बनने से पहले ही एक धागा तान बता दी थी। एक पुल इस नदी पर बनेगी जो नेपाल बिहार की लाइफ लाइन सिद्ध होगी। फिर इसी जगह पर साधना कर आज से 58 वर्ष पहले अपनी देह त्याग कर ब्रह्मलीन हो गए। आज दूर-दूर से श्रद्धालु इस स्थान पर आकर नरसिंह बाबा के समाधि की दर्शन कर मन्नत मांगते हैं। वही बहुत सारे श्रद्धालु भक्तों द्वारा समाधि समारोह में भंडारे का आयोजन कर निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की जाती हैं। इस भंडारे की खास बात यह है कि इसमें वितरण की जाने वाली सारे प्रसाद रूपी पकवान अति स्वादिष्ट होते हैं। बताया जाता है की छपरा जिला से करीब 80 वर्ष पहले आया एक लम्बा सावला कद का युवा उस समय के बीरान गंडक के किनारे खुले आसमान मे ऱहने लगा। जिसे देख रामपुर खजुरिया के कुछ प्रबुद्ध जन उसे अपने गांव मे रहने का आग्रह किया।
आग्रह को मान युवक कभी-कभी गांव में आने लगा। गांव में किसी बीमार को देख गाली देने लगता था, जैसे ही वह यूवक वहां से जाता बीमार ब्यक्ति स्वस्थ हो जाता था । खेत में बैल से हल जोत रहे किसानों का हल छीन किसान को भगा देता था, स्वयं
हलजोत बैल को छोड़ देता था। बैल बगैर भटके किसान के घर पहुंच जाता था। वही युवक आगे चलकर नरसिंह दास से नरसिंह बाबा कहलाया। औघड़ बाबा के नाम से विख्यात हो गया। 58 वर्ष पहले अगर बाबा ने समाधि ले ली। फलस्वरूप आज वह जगह आस्था का केन्द्र बन गया है ।

