गेहूँ की फसल में कैसे करे उर्वरक का प्रबंधन ?
पूर्वी चंपारण। गेहूँ की फसल में उर्वरक(खाद) प्रबंधन की जानकारी देते परसौनी कृषि विज्ञान केंद्र के मृदा विशेषज्ञ डा.आशीष राय ने किसानो को बताया कि गेहूँ भारत सहित अनेक देशों में खाद्य सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है। बढ़ती जनसंख्या, घटती कृषि भूमि, जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की उर्वरता में लगातार गिरावट तथा अधिक उत्पादन की आवश्यकता को देखते हुए गेहूँ में उर्वरक प्रबंधन होना आवश्यक है।उर्वरक प्रबंधन वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत पौधे की आवश्यकता के अनुसार उचित मात्रा में, उचित समय पर, उचित प्रकार के पोषक तत्व उपलब्ध कराए जाते हैं। जिसका उद्देश्य पौधों को वृद्धि के प्रत्येक चरण में संतुलित पोषण देना, उपज क्षमता को अधिकतम करना तथा मिट्टी की गुणवत्ता को दीर्घकाल तक बनाए रखना है।

गेहूँ भारत ही नही पूरी दुनिया की सर्वाधिक उगाई जाने वाली खाद्यान्न फसलों में से एक है, जिसकी उपज का सीधा संबंध पोषक तत्वों की उपलब्धता, मात्रा और उपयोग दक्षता से है। उच्च उपज प्राप्त करने के लिए पौधों को उनकी वृद्धि के प्रत्येक चरण—अंकुरण, टिलरिंग, ज्वाइंटिंग, बूटिंग, फ्लोरिंग तथा दाना भराव पर संतुलित और उचित मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है।सही उर्वरक प्रबंधन के अभाव में पौधे आवश्यक पोषण नहीं ले पाते, जिसके परिणामस्वरूप टिलर कम बनते हैं, पत्तियाँ पर्याप्त प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पातीं लिहाजा बालियाँ छोटी रह जाती हैं और दानों का भराव कमजोर होता है। ऐसे में बेहतर उर्वरक प्रबंधन न केवल फसल को आवश्यक पोषक तत्व देता है, बल्कि उपज को बढ़ा सकता है।
डा.राय ने बताया कि मिट्टी की उर्वरता का संरक्षण कृषि उत्पादन का सबसे बड़ा आधार है और उसकी उर्वरता का स्तर फसल उत्पादन की गुणवत्ता व स्थिरता को निर्धारित करता है। असंतुलित उर्वरक उपयोग, लगातार एक ही पोषक तत्व का प्रयोग, कार्बनिक पदार्थों की कमी और रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग मिट्टी में पोषक तत्व असंतुलन और उर्वरता ह्रास का मुख्य कारण है।वैज्ञानिक ढंग से उर्वरक प्रबंधन मिट्टी के दीर्घकालीन स्वास्थ्य को बढ़ाता है जैसे पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखना मिट्टी में बड़े (macronutrients) और सूक्ष्म (micronutrients) दोनों पोषक तत्वों की उचित उपलब्धता बनाए रखना आवश्यक है। केवल यूरिया पर निर्भरता मिट्टी में नाइट्रोजन व कार्बन असंतुलन को बढ़ाती है।उचित फास्फोरस व पोटाश देने से जड़ क्षेत्र तथा मृदा संरचना अच्छी रहती है।सल्फर व जिंक मिट्टी के pH को स्थिर रखते हैं। कार्बनिक पदार्थ का संरक्षण के लिए वर्मी-कम्पोस्ट और हरी खाद का उपयोग बेहद जरूरी है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता अच्छी रहती है, सूक्ष्मजीव गतिविधि अच्छी रहती है जिससे पोषकतत्व का चक्रण तेजी से होता है। संतुलित पोषक तत्व की उपलब्धता से मिट्टी के कणों में एग्रिगेशन बढ़ता है, जिससे वातन में सुधार होकर जड़ो की वृद्धि बेहतर होती है और मिट्टी क्षरण कम होता है।

डा.राय ने बताया कि पोषक तत्व उपयोग दक्षता वह अनुपात है, जिसमें पौधा उर्वरक में दिए गए पोषक तत्वों का कितना प्रतिशत प्रभावी रूप से उपयोग करता है। गेहूँ में विशेष रूप से नाइट्रोजन उपयोग दक्षता को बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। नाइट्रोजन को 2–3 भागों में देने से पौधे की मांग के अनुसार पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं और उसका नुकसान कम होता है। नीम-लेपित यूरिया का उपयोग से यूरिया की घुलनशीलता धीमी होती है।जिसे नाइट्रोजन का नुकसान कम होता है,उर्वरक को जड़ क्षेत्र में डालने से पोषक तत्व सीधे पौधो को उपलब्ध होते हैं।गेहूँ की फसल में जिंक व सल्फर की कमी नाइट्रोजन उपयोग को घटाती है। यदि जिंक और सल्फर पर्याप्त हों तो दोनों की उपयोग दक्षता बढ़ते हैं।
वही परसौनी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डाॅ अंशू गंगवार ने बताया कि सही समय पर सिंचाई करने से पोषक तत्वों का संचरण बेहतर होता है और लीचिंग कम होती है। इनके उपयोग से रासायनिक उर्वरक की दक्षता बढ़ती है। उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने से न केवल उत्पादन बढ़ता है बल्कि लागत कम होती है और पर्यावरण प्रदूषण भी घटता है। दाने की गुणवत्ता से
गेहूँ की केवल उपज पर निर्भर नहीं करती, बल्कि दाने की संरचना, प्रोटीन प्रतिशत, ग्लूटेन गुणवत्ता, दानों का आकार व कठोरता आदि पर भी निर्भर करती है। पोषक तत्व दाने की गुणवत्ता को वैज्ञानिक रूप से प्रभावित करते हैं। नाइट्रोजन के अवशोषण से गेहूँ के दानों में प्रोटीन प्रतिशत बढ़ता है,जिससे ग्लूटेन शक्ति में सुधार होकर आटे की गुणवत्ता बेहतर होती है।उस गेहूँ के आटे से बने ब्रेड/रोटी मुलायम और पोषण तत्वो से भरपूर होते है।अत्यधिक नाइट्रोजन दाने का आकार बढ़ाता है परंतु प्रोटीन गुणवत्ता को कभी-कभी घटा भी सकता है,ऐसे में इसके संतुलन जरूरी है।गेहूँ में फास्फोरस का भी बड़ा योगदान होता है,इससे पौधे की शुरुआती वृद्धि व जड़ तेजी से विकसित होते है। इसके प्रयोग से बालियों के विकास व दानों की मोटाई और घनत्व में वृद्धि होती है।
पोटाश के प्रयोग से पौधों में जल-संतुलन नियंत्रित होता है,जिससे एंजाइम सक्रियता बढ़ती है और दानों का भराव समान रूप से होता है। गेहूँ के दाने की कठोरता बढ़ाने के लिए सल्फर से बड़ा सहयोग मिलता है।
सल्फर प्रोटीन संश्लेषण में आवश्यक अमीनो एसिड (मेथियोनिन, सिस्टीन) बनाता है।इससे दाने की गुणवत्ता में सुधार होता है
जिंक के प्रयोग से दाने में माइक्रो-न्यूट्रिएंट बढ़ता है
बोरॉन के प्रयोग से बालियों में दाने की संख्या बढ़ता है
माइक्रो-न्यूट्रिएंट का संतुलित उपयोग “बायो-फोर्टिफाइड गेहूँ” की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिससे मानव स्वास्थ्य में सुधार होता है।
गेहूँ के लिए 17 आवश्यक पोषक तत्व आवश्यक होते हैं। इनमें प्रमुख हैं नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटाश (K), सल्फर (S) तथा सूक्ष्म पोषक तत्व जिंक, लोहा, मैंगनीज, तांबा,बोरॉन आदि हैं।
डा.गंगवार बताते है,कि गेहूँ में उर्वरक प्रबंधन शुरू करने के पूर्व मिट्टी की जांच अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे पोषक तत्व की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिलती है,लिहाजा किसान भाई को
उर्वरक की सही मात्रा का निर्धारण कर सकते है,साथ ही
अनावश्यक व अतिरिक्त उर्वरक उपयोग भी रोका जा सकता है
गेहूँ के लिए नाइट्रोजन , फास्फोरस, पोटाश उर्वरक की सामान्य अनुशंसित मात्रा
सिंचित क्षेत्र के लिए
नाइट्रोजन (N): 120–150 kg प्रति हेक्टेयर,फास्फोरस (P₂O₅): 60–75 kg प्रति हेक्टेयर,पोटाश (K₂O): 40–60 kg प्रति हेक्टेयर
गेहूँ के वृद्धि चरणों के अनुसार उर्वरक प्रबंधन:
बुवाई पूर्व: मिट्टी परीक्षण के आधार पर बेसल डोज CRI चरण: नाइट्रोजन देने का सबसे महत्वपूर्ण समय टिलरिंग: टिलर संख्या बढ़ाने हेतु
जॉइन्टिंग–बूटिंग: फोलियर स्प्रे लाभकारी
दाना भराव समय: अत्यधिक नाइट्रोजन न दें
संतुलित उर्वरक प्रबंधन गेहूँ उत्पादन की रीढ़ है। पौधे की आवश्यकता के अनुसार सही पोषक तत्व, सही समय पर, सही मात्रा में तथा सही विधि से देकर उपज, मृदा स्वास्थ्य, लाभ–लागत अनुपात और पर्यावरणीय स्थिरता सभी को सुनिश्चित किया जा सकता है।

