त्योहारों एवं ऋतुओं के संग बदलता है बिहार के बाजारो का रंग

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पटना/मोतिहारी।बिहार की संस्कृति और परंपराओं की सबसे खूबसूरत झलक यहाँ के बाज़ारों में देखने को मिलती है। जैसे-जैसे ऋतुएँ बदलती हैं, त्योहारों का आगमन होता है और उसी के साथ यहाँ के बाज़ारों का रंग-रूप भी पूरी तरह बदल जाता है।बाजार का यह बदलता दृश्य न केवल यहाँ की आर्थिक गतिविधियों को गति देता है, बल्कि लोक आस्था और जन-जीवन के गहरे जुड़ाव को भी उजागर करता है।

कार्तिक मास में वर्ष का सबसे बड़ा व्यापारिक समय धनतेरस और दीपावली पर देखने को मिलता है, जब बाज़ार जगमगा उठते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण, नए बर्तन, रंग-बिरंगे दीये, झालरें और सजावटी सामानों की भारी बिक्री होती है।

इसके बाद आता है उत्तर भारत और बिहार का सबसे पवित्र लोक आस्था का महापर्व छठ। इस दौरान बिहार का ऐसा कोई कोना या दुकान नहीं होती जहाँ छठ व्रत से जुड़ी सामग्रियाँ न मिल रही हों। सूप, दउरा, फल व अन्य मौसमी फल सामग्री और गन्ने से बिहार का हर शहर पटा रहता है।

इसके बाद बिहार समेत संपूर्ण देश में अलग-अलग नाम से खिचड़ी का त्योहार मनाया जाता है जिसमें बाजार दही, चुरा तिल, गुड़, लाई एवं कसार मीठी खुशबू से एक अलग माहौल पैदा कर देता है।वहीं फागुन मास में विद्या की देवी मां सरस्वती की प्रतिमा और बाजार में सजावटी सामान छा जाता है उसके बाद आता है रंगों का त्योहार होली जिसमें खाद्य सामग्री कपड़े एवं रंग गुलाल से पूरा बाजार रंग बिरंगा दिखने लगता है।

भारतीय कैलेंडर अनुसार चैत्र मास की शुरुआत शुरुआत होती है तो नवरात्र एवं रामनवमी के जैसे त्योहारों में पूरा बाजार तिलंगी, ध्वज एवं अन्य पूजन सामग्रियों से छा जाता है।

सावन का महीना आते ही पूरा बिहार केसरिया रंग में रंग जाता है। मुख्य बाज़ारों से लेकर गलियों की दुकानों तक, भगवान भोलेनाथ के पूजन सामग्रियाँ, बेलपत्र, भांग और केसरिया वस्त्र छा जाते हैं।

इसके तुरंत बाद राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस पर देशभक्ति का माहौल बनता है, जहाँ हर दुकान तिरंगे की विविध कलाकृतियों, झंडों और सजावटी सामानों से सज उठती है।तारीखों के आगे बढ़ते ही भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक राखी का त्योहार आता है। बाज़ारों में सजी रंग-बिरंगी राखियों की दुकानें और मिठाइयों की महक हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है।

माह बदलते ही जन्माष्टमी के अवसर पर दुकानों में बाल-गोपाल के सुंदर वस्त्र, मुकुट, बांसुरी और श्रृंगार के सामानों की भरमार दिखती है,

वहीं शारदीय नवरात्रि और दशहरा में माँ दुर्गा के पूजन-सामान से बाज़ार गुलज़ार रहते हैं।इसी के साथ ईद महापर्व पर बाजारो में सेवई,सूखे मेवे की भरमार रहती है।

बिहार का बाज़ार केवल वस्तुओं के क्रय-विक्रय का केंद्र नहीं है, बल्कि यह यहाँ के बदलते मौसम, उमंग और हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक सजग दर्पण है।

anand prakash

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