धान की फसल को खैरा रोग से बचाने और ज्यादा ऊपज के लिए जिंक का करे इस्तेमाल: डाॅ आशीष राय
पूर्वी चंपारण। जिले मेंं इस धान की बुवाई और रोपाई जोरों पर है, लेकिन इस मौसम में धान की फसल को लगने वाला ‘खैरा रोग’ किसानों के लिए एक बड़ी चिंता का कारण है।ऐसे में कृषि विज्ञान केंद्र परसौनी के मृदा विशेषज्ञ डा.आशीष राय ने किसानो के लिए एक एडवाइजरी जारी करते उन्हे सलाह दी है,कि धान की फसल पर प्राय:खैरा रोग की चपेट ज्यादा होती है। इस रोग से फसल को बचाने का सबसे अचूक उपाय जिंक नामक पोषक तत्व का सही इस्तेमाल है।क्योकी मिट्टी में जिंक यानी जस्ते की कमी के कारण धान में खैरा रोग फैलता है। इस रोग के लक्षण रोपाई के 15 से 20 दिनों के बाद दिखाई देने लगते हैं।
क्या है लक्षण
शुरुआत में धान की बीच की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे इन पत्तियों पर कत्थई (भूरे-लाल) रंग के धब्बे उभर आते हैं और पौधों का विकास रुक जाता है। अगर समय पर इलाज न किया जाए, तो पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।
कैसे करे बचाव
डा.आशीष राय ने इससे बचने के लिये किसानों को सलाह दी है कि वे लक्षण दिखने का इंतजार न करें, बल्कि पहले से ही मिट्टी में जिंक का सही तालमेल बनाकर चलें।धान की रोपाई से ठीक पहले, आखिरी जुताई के दौरान प्रति एकड़ 10 से 12 किलोग्राम जिंक सल्फेट (21%)मिट्टी में मिला दें।
यदि खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत जिंक का स्प्रे करें। इसके लिए 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट और 0.25 प्रतिशत बुझा हुआ चूना को पानी में घोलकर धान के फसल पर छिड़काव करें और आवश्यकता पड़ने पर 10-12 दिनों के बाद दूसरा छिड़काव भी किया जा सकता है।जिंक का इस्तेमाल कभी भी फॉस्फेटिक खादों (जैसे DAP या NPK) के साथ मिलाकर सीधे न करें। इससे जिंक का असर कम हो जाता है। दोनों के इस्तेमाल में कुछ दिनों का अंतर जरूर रखें।
समय पर जिंक का प्रयोग कर किसान न सिर्फ अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं, बल्कि धान की गुणवत्ता और पैदावार को भी लगभग 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं।
जिंक की कमी के पौधों में लक्षण
जिंक की कमी के लक्षण सबसे पहले पौधे की पुरानी और बीच की पत्तियो पर कत्थई या भूरे धब्बे दिखते हैं,और पौधे का विकास रुक जाता है। पौधे झाड़ीदार दिखने लगते हैं और उनमें कल्ले कम फूटते हैं,मिट्टी में जिंक की कमी होने पर पौधों की बालियां ठीक से नहीं बनतीं और फसल देर से पकती है।आमतौर पर जिस मिट्टी का pH मान अधिक हो (7.5 से ज्यादा या क्षारीय मिट्टी है) या
जिन खेतों में बहुत ज्यादा जलभराव रहता है,या जहाँ किसान नाइट्रोजन और फॉस्फोरस (जैसे DAP) का बहुत अधिक इस्तेमाल करते हैं, वहाँ भी मिट्टी में मौजूद जिंक ब्लॉक हो जाता है और पौधों को नहीं मिल पाता।ऐसे में जिंक की कमी को दूर करने के लिए किसान दो तरीके अपना सकते है,पहला खेत तैयार करते समय और दूसरा खड़ी फसल में।
खेत की तैयारी के समय जिंक सल्फेट खेत की आखिरी जुताई के समय 10 से 12 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से जिंक सल्फेट मिट्टी में मिला दें।अगर रोपाई के बाद भी फसलों में लक्षण दिखने लगें तो
75 ग्राम जिंक सल्फेट + 37.5 ग्राम बुझा हुआ चूना 15 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करे। चूने का पानी जिंक सल्फेट के एसिडिक असर को कम करता है जिससे पत्तियां जलती नहीं हैं।
चूने को भिगोना या छिड़काव से 14-15 घंटे पहले बिना बुझा हुआ चूना लें इसे एक प्लास्टिक की बाल्टी में पानी डालकर रातभर के लिए छोड़ दें।सावधानी चूने में पानी डालते समय गर्मी और गैस निकलती है, इसलिए इसे लोहे या एल्युमिनियम के बर्तन में न रखें और दूरी बनाए रखें।अगली सुबह चूना बाल्टी के नीचे बैठ जाएगा और ऊपर बिल्कुल साफ, पारदर्शी पानी आ जाएगा। इस ऊपर वाले साफ पानी को एक सूती कपड़े की मदद से छानकर दूसरी प्लास्टिक की बाल्टी में अलग कर लें। नीचे बैठे गाढ़े चूने (पेस्ट) को फेंक दें उसे स्प्रे टैंक में नहीं डालना है।फिर जिंक के साथ उसका छिड़काव करे।

