सूचना के बिना अज्ञानता दूर नहीं हो सकती: हरिवंश

सूचना के बिना अज्ञानता दूर नहीं हो सकती: हरिवंश
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नई दिल्ली। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने रविवार को कहा कि जिस तरह सूर्य के बिना अंधेरा नहीं मिट सकता, वैसे ही सूचना के बिना अज्ञानता दूर नहीं हो सकती।हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में दिल्ली स्थित इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) तथा माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल द्वारा आयोजित दो-दिवसीय कार्यक्रम ‘हिन्दी पत्रकारिता द्विशताब्दी महोत्सव’ के समापन के अवसर पर कही।इस कार्यक्रम में “हिन्दी पत्रकारिता : भविष्य, चुनौतियां और संभावनाएं” विषय पर आधारित है।

इस सत्र के दौरान आईआईएमसी के प्रो. प्रमोद कुमार द्वारा संपादित पुस्तक ‘पारखी दृष्टि में समग्र भारतीय पत्रकारिता’ का भी लोकार्पण किया गया।

हरिवंश जी के अनुसार, भारत के पहले हिंदी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ के मास्टहेड के नीचे एक संस्कृत श्लोक अंकित था, जिसका मूल भाव था: “जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश के बिना अंधकार का नाश नहीं हो सकता, उसी प्रकार सूचनाओं के बिना अज्ञानता दूर नहीं की जा सकती। इसी उद्देश्य से मैं इस समाचार पत्र के प्रकाशन का प्रयास कर रहा हूँ।”

उन्होंने बताया कि पत्रकारिता का मूल धर्म भी यही है समाज से अज्ञानता के अंधेरे को मिटाना। इसका एक सटीक उदाहरण 05 सितंबर 1826 को इसी अखबार में छपी एक रिपोर्ट है, जिसका शीर्षक था ‘विलायती कपड़ा’। इस खबर में देश के आर्थिक दोहन का बारीक गणित सामने रखा गया था। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया कि जो ब्रिटिश कपड़ा नौ साल पहले तक सालाना सिर्फ डेढ़ लाख रुपये का आता था, वह देखते ही देखते 60 करोड़ रुपये तक कैसे पहुँच गया?

हरिवंश ने कहा कि आज से दो सदी पहले, एक पत्रकार यह बखूबी समझ रहा था कि भारत की गुलामी की असली जड़ आर्थिक शोषण है। लेकिन आज, जब हम हिंदी पत्रकारिता का द्विशताब्दी वर्ष मना रहे हैं, तो हमें आत्ममंथन करना होगा। सवाल यह है कि जिस ‘देश और समाज’ की चिंता से इस पत्रकारिता का जन्म हुआ था, आज की पत्रकारिता में वह देश कहाँ है? क्या आज का मीडिया देश के बुनियादी आर्थिक सवालों को लेकर उतना ही सजग है?

रामबहादुर राय ने आपातकाल को याद करते हुए कहा, उस दौरान भूमिगत आंदोलन में अगर साहित्य का वितरण अगर कोई कर सका, तो वह आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। मेरा मानना है कि आपातकाल अनाश्यक थी। आपातकाल सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए लगाई गई कि इंदिरा गांधी अपनी लोकसभा की सदस्यता को बचाए रखना चाहती थीं।

इससे पहले, संगोष्ठी का प्रथम सत्र “हिन्दी पत्रकारिता के 200 साल : पुनरावलोकन” विषय पर हुआ, जिसकी अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने की।

उन्होंने कहा कि पं. युगल किशोर शुक्ल ने ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ की शुरुआत लोगों को जगाने के बड़े लक्ष्य के साथ की थी। अख़बार प्रतिरोध का काम करते रहे हैं। पत्रकारिता में जो नैतिक साहस था, अब वह खंडित हो रहा है। नैतिकता और प्रतिरोध एक दूसरे से जुड़े हैं। नैतिकता होगी, तभी प्रतिरोध होगा। संवाद का महत्त्व कभी ख़त्म नहीं होगा और अख़बार कभी ख़त्म नहीं होगा।

इस सत्र में प्रो. कृपाशंकर चौबे ने हिन्दी पत्रकारिता के विकास में अहिन्दीभाषी मनीषियों के महत्त्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया।

डॉ. धनंजय चोपड़ा ने हिन्दी पत्रकारिता और जनआंदोलनों के सम्बंधों की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी पत्रकारिता ने सभी आंदोलनों को हाथों हाथ लिया है।

प्रो. वर्तिका नंदा ने दृश्य-श्रव्य माध्यम की हिन्दी पत्रकारिता, प्रो. हरबंश दीक्षित ने हिन्दी पत्रकारिता : संवैधानिक अधिकार और सरकार तथा प्रो. उषारानी राव ने दक्षिण भारत में हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा और उसके विस्तार का विस्तृत परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया।

संगोष्ठी के दोनों सत्रों में उपस्थित प्रतिभागियों ने हिन्दी पत्रकारिता की ऐतिहासिक उपलब्धियों का स्मरण करते हुए उसे नए समय की चुनौतियों के अनुरूप अधिक सशक्त, उत्तरदायी और तकनीकी रूप से सक्षम बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

anand prakash

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