समय पर बुवाई और ज़ीरो टिलेज से किसान बढ़ा सकते हैं गेहूं की पैदावार:डा.आशीष राय
पूर्वी चंपारण।समय पर बुवाई और जीरो टिलेज को अपना कर किसान भाई गेहूँ की बंपर पैदावार प्राप्त कर सकते है उक्त बाते पूर्वी चंपारण जिले के परसौनी स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र में फसल संग्रहालय में गेहूँ की उन्नत और नयी किस्मों को दिखाते किसानो को दिखाते हुए
डाॅ आशीष राय, मृदा विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र परसौनी ने कही।उन्होने कहा कि विगत कई दिनों से मौसम में लगातार तापमान में गिरावट जारी है। पिछले महीने हुई असामान्य वर्षा से धान कटनी में भी देरी हुई है जिससे आलू, सरसो और मटर की बुवाई में देरी हुई है,जलवायु परिवर्तन की इन चुनौतियों से निपटने के लिए किसानो को जीरो टिलेज अर्थात शून्य जुताई विधि को अपनाना चाहिए।कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को बेहतर खेती के सुझाव देते हुए कहा कि उन्नत बीज का चयन बंपर पैदावार का सबसे प्रमुख पहलु है,इसको लेकर बताया गया कि डी बी डब्ल्यू -187 (करण वंदना) प्रभेद को राज्य के उत्तरी इलाकों और खासकर पूर्वी चंपारण के लिए उपयुक्त पाया गया है। कृषि विज्ञान केंद्र परसौनी के मृदा विशेषज्ञ डाॅ आशीष राय के अनुसार शून्य जुताई विधि या लाइन से बुवाई विधि से खेती करने से पिछले वर्ष 10 से 15 फ़ीसदी अधिक पैदावार दर्ज की गई है। इस विधि से लागत भी प्रति हेक्टेयर 8-10 हजार रुपए कम है। इसके अलावे राजेंद्र गेहूं-3, राजेन्द्र गेहूं-4 जैसे प्रभेद भी उत्तर बिहार में बदलते जलवायु के लिहाज से उपयुक्त है।

वही डाॅ अंशू गंगवार, कृषि अभियांत्रिकी विशेषज्ञ, केवीके के परसौनी ने बताया कि रबी की फसलों की बुवाई शुरू हो चुकी है। असमय बरसात के कारण अधिक नमी की वजह से जुताई में कठिनाई और ढेलों के निर्माण आदि के कारण खेत तैयारी में अधिक समय लगने से फसल की बुवाई में देरी हो रही है। ऐसे में गेहूं, सरसों/तोरा/तोरी और मसूर की बुवाई कई तरीके से किया जा सकता है। जाती है,खेत की तैयारी और बुआई की परम्परागत पद्धति के विपरीत जीरो टिलेज (शून्य जुताई) तकनीक अपनाने से न केवल बुआई के समय में 15-20 दिनों की बचत सम्भव है। बल्कि उत्पादकता का उच्च स्तर बरकरार रखते हुए खेत की तैयारी पर आने वाली लागत पूर्णतः बचायी जा सकती है। जीरो टिलेज तकनीक से गेहूं, सरसों और मसूर की बुवाई करने के लिए, धान की कटाई के तुरंत बाद जीरो टिल-सह-फर्टि सीड ड्रिल का उपयोग करें, जिसमें पिछले फसल के अवशेषों को हटाए बिना बीज और खाद एक साथ बोए जाते हैं। जीरो टिलेज विधि से इन फसलों को लगाने वाली भूमि की जुताई नहीं की जाती है। बुआई के लिए एक मशीन जिसे जीरो टिले-सह-फर्टि सीड ड्रिल मशीन प्रयोग में लायी जाती है, जिससे फसलों की बुआई उचित गहराई पर बिना जुते खेतों में करना बहुत आसान होता है।जीरो टिलेज तकनीक में उपयोग होने वाली मशीन में रोटावेटर सह सीडड्रिल या रोटावेटर सह फर्टिड्रिल का प्रयोग किया जाता है। जिसमें घूमने वाला जुताई का फार लगा रहता है। साथ ही इस मशीन में बीज डालने और खाद डालने के लिये सीडड्रिल या फर्टीलाईजर का बॉक्स तथा पाटा भी लगा रहता है। मशीन अपने घूमने वाले फार से खेत की मिट्टी में चीरा बनाते हुये बीज को उचित गहराई पर डालकर पाटा भी एक साथ ही लगाते हुये आगे बढ़ता है और एक ही बार में तीन कार्य सम्पन्न होता है।वैज्ञानिकों ने बताया कि जीरो टिलेज तकनीक से मिट्टी की संरचना और उर्वरता में सुधार होता है, नमी लंबे समय तक बनी रहती है तथा जल, श्रम और ईंधन की बचत होती है। इस विधि पराली जलाने की भी आवश्यकता नही होती है,परिणामस्वरूप पर्यावरण प्रदूषण भी घटता है और फसल का अवशेष मिट्टी की सतह पर मल्च का कार्य करते हैं। इसके उपयोग से उत्पादन लागत कम होती है, समय की बचत होती है और फसलों की पैदावार में वृद्धि होती है। साथ ही, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार के कारण यह तकनीक सतत कृषि के लिए अत्यंत लाभदायक माना गया है।

