आपरेशन सिंदूर और बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक में स्वदेशी हथियारों ने किया कमाल : राधामोहन
-भारत 85 से अधिक देश को देता है सैन्य सामग्री
-‘जय जवान जय किसान जय विज्ञान’ कार्यक्रम में सांसद ने देश की सैन्य शक्ति को बताया
मोतिहारी। जिस देश के पास अपनी अनुसंधान और तकनिको का संसाधन उपलब्ध होता है वह हर विषम परिस्थिति में त्वरित और कठोर निर्णय लेने का काबिलियत रखता है। आज भारत 85 से अधिक देशों को सैन्य युद्ध सामग्री उपलब्ध कराता है , यह अपने आप में गौरव का विषय है।
हथियार बनाना ही जरूरी नहीं अपितु उसका तकनीक अपने हाथ में होना आवश्यक होता है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के साथ किसान और विज्ञान को जोड़कर देश की क्षमता काफी विकसित हो रही है। बुधवार को बापू प्रेक्षागृह में आयोजित ‘जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान’ सम्मेलन में सांसद एवं रक्षा संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष राधामोहन सिंह ने उक्त बातें कहीं।
उन्होंने कहा कि देश का जवान सीमा की रक्षा करता है, किसान खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालता है और वैज्ञानिक देश की तकनीक में न्याय आयाम गढ़ता है। इन तीनों को अलग-अलग देखकर विकास अधूरी ही रह जायेगी। डीआरडीओ की अत्याधुनिक तकनीकों की वजह से दुनिया भारत की ओर देखने से पहले कई बार साेचती है। कश्मीर का बालाकाेट सर्जिकल स्ट्राइक हाे या अाॅपरेशन सिंदूर। सभी में देश के जवानाें ने स्वदेशी तकनीक से दुश्मनाें के छक्के छुडा दिए।
उन्होंने कहा कि हमारे यहाँ पौराणिक काल और दूसरे युगों में ब्रह्मास्त्र होता था , अब ब्रामोश मिसाइलें दुश्मनो के छक्के छुड़ाते है।यह मिशाइल अाॅपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के लिए काल बन गया था। राधामोहन सिंह ने रक्षा क्षेत्र में देश की आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि बदलते समय में तकनीक युद्ध की दिशा तय कर रही है।
आधुनिक रक्षा प्रणाली में अनुसंधान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, निगरानी, संचार और अत्याधुनिक उपकरणों की भूमिका बढ़ रही है। इसलिए रक्षा अनुसंधान को देश की रणनीतिक ताकत बनाने की जरूरत है। उन्होंने ‘जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान’ को व्यापक अर्थ में देखने की बात कही। किसान की उत्पादकता बढ़ाने में विज्ञान की भूमिका है तो जवान की क्षमता बढ़ाने में भी विज्ञान जरूरी है।
कृषि में नई तकनीक, बेहतर बीज, सिंचाई, कृषि मशीनरी और वैज्ञानिक सलाह से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। कहा कि अनुसंधान का लाभ तभी पूरा माना जाएगा, जब उसका असर खेत और सीमा दोनों पर दिखाई दे। विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों, रक्षा अनुसंधान संगठनों और किसानों के बीच बेहतर तालमेल बनाने की जरूरत है। उन्होंने अनुसंधान को केवल वैज्ञानिक संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय उसके व्यावहारिक उपयोग पर जोर दिया।
कृषि विश्वविद्यालयों में विकसित तकनीक किसान तक पहुंचे और रक्षा प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक देश की सुरक्षा क्षमता बढ़ाए, यही अनुसंधान की उपयोगिता है।
श्री सिंह ने इस अवसर पर सांसद निधि से निर्मित डिफेंस कैंटीन एवं स्टोर भवन का उद्घाटन भी किया । इसके अलावे एचएएल और रक्षा मंत्रालय के सीएसआर फंड से निर्मित बालिका छात्रावास और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के वित्तपोषण से प्रस्तावित डिफेंस एन्क्लेव प्रदर्शनी केंद्र का शिलान्यास भी हुआ।

