“तुम वंशी बजाते हो या मुझे बुलाते हो” भारतीय व बिहार के लोक रंगों में सराबोर रहा 18वां लीचीपुरम उत्सव

“तुम वंशी बजाते हो या मुझे बुलाते हो” भारतीय व बिहार के लोक रंगों में सराबोर रहा 18वां लीचीपुरम उत्सव
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मेहसी (पूर्वी चंपारण)।18वें लीचीपुरम उत्सव 2026 का समापन सांस्कृतिक वैभव, लोक परंपराओं और कला की अद्भुत छटा के बीच हुआ। राजकीय तिरहुत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मेहसी का विशाल प्रांगण मंगलवार की रात संगीत, नृत्य और लोक संस्कृति के रंगों से इस तरह जगमगा उठा मानो चंपारण की सांस्कृतिक आत्मा स्वयं मंच पर उतर आई हो। दर्शकों की तालियों और उत्साह से पूरा वातावरण देर रात तक गुंजायमान रहा।

कार्यक्रम की सबसे आकर्षक प्रस्तुतियों में चंपारण की प्रतिभाशाली बेटी अनुप्रिया तिवारी का गायन रहा। अपनी मधुर, खनकती और भावपूर्ण आवाज से उन्होंने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति ने यह साबित कर दिया कि चंपारण की धरती प्रतिभाओं से परिपूर्ण है और यहां की बेटियां राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पहचान बनाने की क्षमता रखती हैं।

अनुप्रिया तिवारी ने मां सरस्वती की वंदना “वर दे, वर दे वीणा वादिनी वर दे” से कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने भक्ति, लोक और भोजपुरी गीतों की ऐसी श्रृंखला प्रस्तुत की कि पूरा पंडाल सुरों की सरिता में बहने लगा। “राम नाम के साबुन से जो मन का मैल धोएगा, निर्मल मन के दर्पण में वह राम का दर्शन पाएगा” जैसे भक्ति गीतों ने आध्यात्मिक वातावरण का सृजन किया, वहीं “ले ले आई है बलमा बजरिया से चुनरी” और “जैसन-जैसन सोचले रहनी, वैसन पियवा मोर बा” जैसे लोकप्रिय भोजपुरी गीतों पर दर्शक झूम उठे।

सांस्कृतिक संध्या में सृष्टि फाउंडेशन, दरभंगा के कलाकारों ने भी अपनी मनोहारी प्रस्तुतियों से दर्शकों का दिल जीत लिया। संस्था के निदेशक जयप्रकाश पाठक के नेतृत्व में कलाकारों ने कथक नृत्य के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय परंपरा की सुंदर झलक प्रस्तुत की। दुर्गा स्तुति पर आधारित नृत्य ने शक्ति, भक्ति और सौंदर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया।

“तुम बंसी बजाते हो या मुझे बुलाते हो” जैसी भावप्रधान प्रस्तुति ने प्रेम और भक्ति के भावों को जीवंत किया, जबकि घूमर और लोकनृत्यों ने बिहार की समृद्ध लोक-संस्कृति को मंच पर साकार कर दिया। लोकगीतों की धुनों पर कलाकारों की भाव-भंगिमाएं और मनमोहक नृत्य दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने रहे।

वहीं द वन डांस ग्रुप के बाल कलाकारों ने “जब समय होला कमजोर, त हर कोई साथ छोड़ जाला” गीत पर प्रभावशाली अभिनय प्रस्तुत कर सामाजिक यथार्थ को मंच पर जीवंत कर दिया। उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों को भावुक भी किया और जीवन के संघर्षों पर सोचने को भी मजबूर किया।

मुस्कान ग्रुप की बालिकाओं ने अपनी रंगारंग प्रस्तुतियों से पूरे समारोह में उत्साह और उल्लास का संचार किया। उनके नृत्य, समूह प्रस्तुतियां और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। मंच पर उनकी ऊर्जा, आत्मविश्वास और कलात्मक अभिव्यक्ति ने समारोह को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया।

दो दिनों तक चले इस महोत्सव ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि लीचीपुरम उत्सव केवल कृषि और लीची की पहचान का उत्सव नहीं, बल्कि चंपारण की सांस्कृतिक विरासत, लोककला, संगीत और युवा प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बन चुका है। समापन की रात सुरों, तालियों और सांस्कृतिक उल्लास के साथ इस संकल्प को भी मजबूत कर गई कि आने वाले वर्षों में लीचीपुरम उत्सव राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्र पर और अधिक सशक्त पहचान बनाएगा।

anand prakash

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