तिलहन-दलहन समेत सभी रबी फसलो में करे सल्फर का बेहतर प्रबंधन:डा.आशीष राय
पूर्वी चंपारण।तिलहन-दलहन समेत सभी रबी फसलो की बेहतर उपज प्राप्त करने के लिए सल्फर का बेहतर प्रबंधन करना जरूरी है।उक्त बाते सत्याग्रह टाइम्स से विशेष बातचीत के दौरान जिले के पहाड़पुर प्रखंड स्थित परसौनी कृषि विज्ञान केन्द्र के मृदा विशेषज्ञ डा.आशीष राय ने कही।उन्होने कहा कि आमतौर पर रबी फसलो में
सल्फर की कमी से नई पत्तियां पीली पड़ जाती हैं,लिहाजा पौधे की वृद्धि रुक जाती है,जिसका प्रतिकुल प्रभाव पैदावार पर होते है। सल्फर की कमी से दाने कम बनते हैं और पैदावार घट जाती है। यह प्रोटीन, एंजाइम, विटामिन और क्लोरोफिल (प्रकाश संश्लेषण के लिए) के उत्पादन के लिए आवश्यक है, जिससे फसलें हरी और स्वस्थ रहती हैं। तिलहनी फसलों में तेल की मात्रा और दलहनी फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है; प्याज और लहसुन में तीखापन और गंध इसी से आती है। यह फफूंदनाशक (पाउडरी मिल्ड्यू, रस्ट) और कीटनाशक (माइट्स) के रूप में काम करता है, जो कई फंगल रोगों और कीटों से पौधों की रक्षा करता है।साथ सल्फर पौधों को ठंड सहने की क्षमता (शीत सहनशीलता) को बढ़ाता है।
सल्फर की कमी के लक्षण
सबसे पहले नई पत्तियों का रंग पीला (क्लोरोसिस की अवस्था) होना शुरू होता है, जो पत्तियों के सिरे से अंदर की ओर बढ़ता है, इस स्थिति में पौधों की सामान्य वृद्धि बाधित होती है। सल्फर की कमी से पौधों में फूल छोटे लगते हैं और फलियों की संख्या घट जाती है, जिससे तिलहन फसल में बीज और तेल का उत्पादन कम हो जाता है।
सल्फर का महत्व
सल्फर प्रोटीन और तेल (विशेषकर तेल की मात्रा) बनाने में मदद करता है, जिससे गुणवत्ता बढ़ती है और साथ ही साथ नाइट्रोजन जैसे अन्य पोषक तत्वों के उपयोग में सुधार करता है इसके अलावा यह फफूंद जनित रोगों और कीटों से सुरक्षा प्रदान करता है.
सल्फर डालने का सही तरीका और समय खेत की तैयारी करते समय अन्य खादों के साथ मिलाकर डालें (जैसे जिप्सम या बेंटोनाइट सल्फर) और यदि नहीं डाल सकते हैं तो पहली सिंचाई पर या बुवाई के 30-35 दिन बाद, जब 5-6 पत्तियां आ जाएं या फूल आने से पहले घुलनशील सल्फर का छिड़काव करें, ताकि यह मिट्टी में जल्दी घुल सके। इसकी सामान्य मात्रा प्रति एकड़ 10-12 किलो की आवश्यकता होती है बस इसमें यह सावधानी रखें कि सल्फर को बीज के सीधे संपर्क में आने से बचाएं।

मिट्टी में सल्फर की कमी कैसे होती है?
ज्यादा ऊपज और सघन खेती से उर्वरकों के बढ़ते उपयोग, सघन फसल प्रणालियों, उच्च उपज वाली फसल किस्मों को बढ़ावा देने के कारण कृषि उत्पादन में वृद्धि से पौधों को सल्फर की ज्यादा आवश्यकता पड़ती है।जब भी बढ़ते पौधों में सल्फर का स्तर आवश्यक स्तर से नीचे गिर जाता है, तो पौधे पर सल्फर की कमी के दृश्य लक्षण दिखाई देने लगते हैं।पौधों में सल्फर की कमी कई मायनों में नाइट्रोजन की कमी के लक्षणों से मिलते-जुलते हैं, नाइट्रोजन के विपरीत, सल्फर की कमी के लक्षण सबसे पहले नई पत्तियों पर दिखाई देते हैं और नाइट्रोजन डालने के बाद भी बने रहते हैं। सल्फर की कमी वाले पौधे छोटे और पतले होते हैं, उनके तने छोटे और पतले होते हैं, उनकी वृद्धि धीमी होती है, दलहनों में नोड्यूलेशन खराब हो सकता है और नाइट्रोजन स्थिरीकरण कम हो जाता है।
मक्का: पौधों की ऊपर की और नई पत्तियों की पूरी लंबाई में शिराओं के बीच पीलापन दिखाई देता है।
अरहर: नई और मध्य की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं, शाखाएँ निकलना, पत्तियों का आकार और फूल आना कम हो जाता है। फूलों में सामान्य पीला रंग नहीं होता और वे समय से पहले झड़ जाते हैं।
सरसों: इसमें पत्तियां मुड़ी हुई और पत्तियों तथा तने के निचले भाग में लालिमा दिखाई देती है। फूल समय से पहले ही झड़ जाते हैं, जिससे फली का निर्माण ठीक से नहीं हो पाता।
गन्ना: शुरुआती पत्तियां एकसमान पीले-हरे रंग की होती हैं।
टमाटर: पौधे सामान्य से छोटे और हल्के हरे रंग के होते हैं। पौधे के विभिन्न भागों में पीलापन आ सकता है।
गेहूं: पौधे में सामान्यतः पीलापन देखा जाता है, जो आमतौर पर शिराओं के बीच अधिक स्पष्ट होता है। पुराने पत्ते हरे रहते हैं।

