शिक्षा पुरस्कार घोटाला को लेकर शिक्षको ने तरेरी आंखे

शिक्षा पुरस्कार घोटाला को लेकर शिक्षको ने तरेरी आंखे
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– कहा,सम्मान के नाम पर व्यापार का चल रहा खेल
मोतिहारी। शिक्षा को समाज की नैतिक रीढ़ माना जाता है। यहीं से ईमानदारी, जिम्मेदारी और मूल्यों का संस्कार विकसित होता है। लेकिन हाल के वर्षों में शिक्षा के इसी पवित्र क्षेत्र में “पुरस्कार” जैसे शब्द को कुछ स्वार्थी और तथाकथित संगठनों द्वारा खुलेआम व्यापार बना दिया गया है। यह केवल एक स्थान या एक घटना की बात नहीं, बल्कि देशभर में फैलती जा रही एक गंभीर और संगठित प्रवृत्ति है।
-कैसे रची जा रही पुरस्कार का जाल
देशभर में सक्रिय कई तथाकथित शैक्षिक संगठन, फाउंडेशन और अवार्ड कमेटियां शिक्षकों को पहले फोन, व्हाट्सएप या ई-मेल के माध्यम से यह बताती हैं कि उनका कार्य “असाधारण” है और उन्हें राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। शुरुआत में यह सूचना सम्मानजनक प्रतीत होती है, लेकिन इसके बाद असली खेल शुरू होता है।
– रजिस्ट्रेशन फीस के नाम पर वसूली
पुरस्कार समारोह से पहले रजिस्ट्रेशन फीस, प्रोसेसिंग चार्ज, सेरेमनी फीस या डॉक्यूमेंटेशन कॉस्ट के नाम पर शिक्षकों से मोटी राशि की मांग की जाती है। कई मामलों में यह राशि इतनी अधिक होती है कि एक ईमानदार शिक्षक के लिए देना न केवल कठिन बल्कि अपमानजनक भी होता है। बावजूद इसके सामाजिक प्रतिष्ठा और “सम्मान छूट जाने” के डर से कई शिक्षक मजबूरी में भुगतान कर देते हैं।
इस संबंध में शिक्षाविदों का कहना है कि जहां पैसे देकर मंच मिलता है, वहां योग्यता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। जब भुगतान अनिवार्य हो जाता है, तो चयन की निष्पक्षता और पवित्रता स्वतः समाप्त हो जाती है। यदि कोई संगठन वास्तव में शिक्षक को सम्मानित करना चाहता है, तो उसे बिना किसी शुल्क और शर्त के सम्मान देना चाहिए।
-शिक्षक बने ग्राहक, शिक्षा बनी बाजार
इन आयोजनों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वे शिक्षा को बाजार और शिक्षक को ग्राहक बना देते हैं। इससे शिक्षक की गरिमा को ठेस पहुंचती है, और समाज में यह संदेश जाता है कि सम्मान खरीदा जा सकता है।
-टीचर्स ऑफ बिहार ने खोला मोर्चा
इसी पृष्ठभूमि में टीचर्स ऑफ बिहार ने शिक्षा पुरस्कार घोटाले के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई है। टीचर्स ऑफ बिहार के फाउंडर शिव कुमार एवं टेक्निकल टीम लीडर ई. शिवेंद्र प्रकाश सुमन ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में सम्मान को व्यापार बनाना न केवल शिक्षकों का अपमान है, बल्कि यह पूरे समाज की मूल्य-व्यवस्था पर सीधा हमला है।  जो संगठन पैसे लेकर पुरस्कार देते हैं, वे शिक्षा की सेवा नहीं, बल्कि उसका शोषण कर रहे हैं। संगठन के प्रदेश प्रवक्ता रंजेश कुमार एवं प्रदेश मीडिया संयोजक मृत्युंजय कुमार ने संयुक्त रूप से कहा कि ऐसे फर्जी और सशुल्क पुरस्कार आयोजनों पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। उन्होंने शिक्षकों से अपील किया है कि वे किसी भी ऐसे पुरस्कार को स्वीकार न करें, जिसमें किसी भी प्रकार का शुल्क लिया जाए।

anand prakash

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