सूर्योपासना का महापर्व छठ नहाय खाय के साथ हुआ शुरू
80 से 100 रुपये तक बिका कद्दू
छठी मैया के गीतों से गुंजने लगी गांव-गली और मुहल्ला
प्रतृति रक्षा के संदेश के साथ इस पर्व में मिलता है स्वच्छता और शुद्धता का प्रमाण
पूर्वी चंपारण।नहाय-खाय के साथ शनिवार से सूर्योपासना का चार दिवसीय महापर्व छठ शुरू हो गया।महापर्व छठ को लेकर घरों में छठी मैया के गीत गुंजने लगी है। इस पर्व में स्वच्छता और शुद्धता का खास ख्याल रखा जाता है, यही वजह है कि हर गांव, गली और मुहल्ला पूरी तरह से स्वच्छ नजर आने लगता है। छठव्रती चावल व गेहूं को चुन-बिनकर तैयार कर नहाय खाय को अंतिम रूप देने में जुटी है,जबकि छठ को लेकर आम की लकड़ी और सूप दउरा की बिक्री भी तेज हो गयी है।छठ के पहले दिन नहाय खाय को लेकर बाजार में कद्दु और अगस्त के फूल का बाजार काफी गरम रहा। आम दिनों से तीन गुणा अधिक दाम 80 रुपए किलो कहू की बिक्री हुई,तो अगस्त के फूल का कीमत एक हजार रुपए किलो रहा। इसके अलावा गोबर के गोयठा और दूध की मांग भी बढ़ गई है। हर तरफ लोग छठ की तैयारी में पूरी आस्था के साथ जुटे हैं। छठ पर्व पर होती है साक्षात प्रकृतिक की पूजा
हिन्दु धर्म में छठ पर्व ही एक ऐसा त्योहार है, जिसमें साक्षात प्राकृतिक की पूजा होती है,और यह पर्व लोगो को प्रकृति रक्षा का संदेश भी देती है यही एक पर्व है, जिसमें उगते और अस्त होते भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की परम्परा है। साक्षात प्रकृति की पूजा होने वाली इस छठ व्रत को कष्टी भी कहा जाता है, इसमें खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद छठव्रती 36 घंटा तक निर्जला उपवास रखती है, जो आस्था का सबसे बड़ा उदाहरण माना गया है।
चार दिनों तक चलने वाली इस पर्व के हर दिन का अलग है महत्व
सूर्योपासना के इस महापर्व की शुरूआत शनिवार से नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ है। शनिवार 25 अक्टूबर से शुरू होकर मंगलवार 28 अक्टूबर तक मनाया जाने वाला इस पर्व में हर दिन का अलग ही महत्व माना गया है।
नहाय-खाय
इस व्रत का प्रथम दिन 25 अक्टूबर शनिवार को नहाय-खाय से शुरू हो गया है। इस दिन छठव्रती प्रातः काल स्नान आदि कर अरवा चावल, चने की दाल, लौकी तथा अगस्त के फूल से विभिन्न व्यंजन तैयार करती हैं। भगवान सूर्यदेव को जल अर्पित कर अपने आराध्य के निमित्त व्यंजन अर्पित करती हैं। पूजा के बाद व्यंजन को सबसे पहले छठव्रती ग्रहण करती हैं और फिर परिजन, कुटुम्ब तथा मित्रजनों को खिलाया जाता है।

खरना
छठव्रत के दुसरे दिन खरना रविवार 26 अक्टूबर को है। छठव्रती प्रातः काल स्नान आदि से निवृत्त होकर दोपहर के बाद फिर से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर घर के किसी स्वच्छ स्थान पर खरना का प्रसाद बनाया जाता है। छठव्रती आम की लकड़ी से गुड़, अरवा चावल, गाय के दूध तथा गाय के शुद्ध घी आदि से खीर बनाती है। शुद्ध आटे की रोटी भी बनायी जाती है। इसके अलावा कुछ लोग सेंधा नमक से चावल और दाल भी बनाते हैं। परंपराओं के अनुसार विभिन्न प्रकार के सात्विक व्यंजन तैयार किये जाते हैं। शुभ मुहुर्त में शांत भाव से छठी मैया और आराध्य देव की पूजा की जाती है। इस प्रसाद को सबसे पहले छठव्रती ग्रहण करती हैं, इसके बाद इसे परिजन और मित्रजनों में खिलाया जाता है। प्रथम अर्घ्य
सोमवार 27 अक्टूबर को अस्ताचलगामी सूर्यदेव को अर्घ्यदान (प्रथम अर्घ्यदान) किया जायगा, इस दिन व्रती ब्रह्म मुहुर्त से पहले नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूजा के निमित्त विभिन्न प्रकार के नेवैद्य तैयार करती हैं। गेहूं आटा, गुड़ व गाय के घी आदि से पकवान, चावल आटा, तिल, गुड़ से लड्डू व अन्य पकवान बनाया जाता है, इसे सूप में सजाया जाता है, जिसे डलिया में रख कर नदी, तालाब अथवा जलाशय तट पर ले जाकर वहां अस्तचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्यदान किया जाता है।
द्वितीय अर्घ्य
मंगलवार 28 अक्टूबर को उदीयमान सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाएगा, जिसे पारण भी कहा जाता है। छठव्रती और श्रद्धालु ब्रह्म मुहुर्त से पहले स्नान आदि से निवृत्त होकर श्रद्धा के साथ डलिया सजा कर छठ घाट ले जाते हैं, जहां घाट पर छठ गीत गाते सूर्यदेव के उदय होने का इंतजार किया जाता है। भगवान भास्कर के उदय होते ही अर्घ्यदान अर्पण शुरू हो जाता है। उसके बाद उदापन की प्रक्रिया के साथ ही छठव्रत का पारण करने के बाद महापर्व छठ सम्पन्न किया जाता है।

