अल नीनो का खरीफ फसलों और मृदा प्रबंधन पर प्रभाव विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला
-किसान सारथी पोर्टल/ऐप पर लाइव पोल और सर्वे के माध्यम से किसानों ने निभाई सहभागिता
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मोतिहारी/सोनमर्ग संवाददाता। जिले के किसानों को डिजिटल तकनीक से जोड़ने और कृषि संबंधी आवश्यक सेवाएं व जानकारियां समय पर उपलब्ध कराने के लिए ‘किसान सारथी ऐप’ लगातार एक महत्वपूर्ण जरिया बनता जा रहा है। इसी कड़ी में, किसान सारथी पोर्टल और मोबाइल एप्लीकेशन पर आयोजित एक विशेष लाइव पोल (सर्वे) के माध्यम से 200 से अधिक पंजीकृत किसानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी सहभागिता दर्ज कराई इसमें कृषि विभाग के कर्मचारियों ने भी सहभागिता किया। तकनीक के जरिए कृषि वैज्ञानिक और किसान आए करीब कृषि विज्ञान केंद्र परसौनी के वैज्ञानिक डाॅ. अंशू गंगवार के अनुसार, इस डिजिटल पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों को उन्नत खेती, मौसम के पूर्वानुमान, सरकारी योजनाओं और लाइव इंटरैक्शन (सीधा संवाद) के माध्यम से सशक्त बनाना है। हाल ही में हुए इस लाइव पोल और सर्वे के दौरान किसानों से खेती-किसानी से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे गए, जिस पर 200 से ज्यादा किसानों ने रियल-टाइम (तुरंत) प्रतिक्रिया दी। कृषि विज्ञान केंद्र के मृदा विशेषज्ञ डाॅ. आशीष राय के द्वारा बुधवार को “अल नीनो का प्रभाव: खरीफ सीजन में फसल उत्पादन और मृदा प्रबंधन रणनीतियां” विषय पर प्रगतिशील किसानों को विस्तार से बताया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य अल नीनो के कारण मानसून में होने वाले बदलावों, सूखे जैसी स्थिति से निपटने और इस दौरान मिट्टी की सेहत को बनाए रखते हुए खरीफ फसलों की उत्पादकता बढ़ाने पर चर्चा करना था। कृषि वैज्ञानिक डाॅ. अंशू गंगवार ने कहा कि किसान कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दें। कृषि वैज्ञानिक ने सत्र की शुरुआत करते हुए बताया कि अल नीनो के प्रभाव के कारण इस साल मानसून में सामान्य से कम या अनियमित बारिश की संभावना बनी हुई है। ऐसे में पारंपरिक रूप से अधिक पानी लेने वाली फसलों के बजाय किसानों को अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है। तिलहन और दलहन: पानी की कमी वाले क्षेत्रों के लिए अरहर और सोयाबीन जैसी फसलें सबसे उपयुक्त विकल्प है ,जो कम पानी में भी बेहतर मुनाफा दे सकती हैं। मृदा विशेषज्ञ डाॅ. आशीष राय ने जोर देकर कहा कि अगर मिट्टी में नमी रोकने की क्षमता अच्छी होगी, तो फसल सूखे की मार को झेल जाएगी। इसके लिए निम्नलिखित वैज्ञानिक तरीकों पर विस्तार से चर्चा की गई। इनमें मल्चिंग खेत की मिट्टी को फसल के अवशेषों या सूखी घास से ढकने की सलाह दी गई, जिससे तेज धूप में भी मिट्टी की नमी हवा बनकर न उड़े (वाष्पीकरण कम हो)।जैविक खादों का उपयोग मिट्टी में गोबर की खाद, केंचुआ खाद और हरी खाद के प्रयोग को बढ़ाने पर जोर दिया गया। यह मिट्टी की जल धारण क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है। कम जुताई वैज्ञानिकों ने कहा खेतों की बार-बार गहरी जुताई करने से बचें, ताकि मिट्टी के भीतर की प्राकृतिक नमी सुरक्षित थे।

