सभी उत्पादों पर ‘कार्बन फुटप्रिंट लेबलिंग’ अनिवार्य करने की मांग को लेकर प्रधानमंत्री को सौंपेंगे ‘अभिनव पत्र’ : अनिल जोशी
नई दिल्ली। पर्यावरण कार्यकर्ता पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने मंगलवार को कहा कि वह ‘नेचर नेटवर्क’ के सहयोग से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जल्द ही पत्र सौंपकर बाजार के सभी उत्पादों पर ‘कार्बन फुटप्रिंट लेबलिंग’ अनिवार्य करने की मांग करेंगे।डॉ. अनिल जोशी ने विश्व पर्यावरण दिवस से तीन दिन पहले नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में “कार्बन फुटप्रिंट” विषय पर आयोजित गोलमेज सम्मेलन को संबोधित किया। यह सम्मेलन आईजीएनसीए और हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज़ एंड कंज़र्वेशन ऑर्गेनाइजेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। इसमें पर्यावरण संरक्षण और उपभोक्ता जागरूकता को लेकर एक अभिनव प्रस्ताव पर चर्चा की गई।
डॉ. जोशी ने बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता जताते हुए कहा कि जिस तरह खाद्य पदार्थों और दवाओं पर पोषण और रासायनिक तत्वों का लेबल लगाया जाता है, उसी तरह हर उत्पाद से पर्यावरण को होने वाले नुकसान की जानकारी भी उपभोक्ताओं को मिलनी चाहिए।

डॉ. जोशी ने सत्याग्रह टाइम्स से कहा, जिस तरह आज बाजार रंग-बिरंगे उत्पादों से भरे पड़े हैं, उसी तरह अब समय आ चुका है कि उन उत्पादों पर कार्बन फुटप्रिंट भी अनिवार्य रूप से लिखा जाए। कम कार्बन फुटप्रिंट वाले उत्पादों को चुनना ही प्रकृति में हमारा सबसे बड़ा योगदान होगा।
एक सवाल के जबाव में उन्होंने बताया कि जिस उत्पाद को बनाने में जितनी कम ऊर्जा का इस्तेमाल होगा, उसका कार्बन फुटप्रिंट उतना ही कम होगा और उसकी लागत भी कम होगी। यदि आप घर में पापड़ बनाते हैं, तो उसमें बहुत कम ऊर्जा लगती है इसलिए उसका कार्बन फुटप्रिंट कम होता है। इसके विपरीत बड़ी कंपनियों में मशीनों द्वारा बनने वाले उत्पादों का कार्बन फुटप्रिंट अधिक होता है। कंपनियां अपने उत्पादों के कार्बन फुटप्रिंट का आकलन पूरी तरह से वैज्ञानिक तरीकों से करवाती हैं।
जोशी ने बताय़ा कि पिछले कुछ दशकों में इंसानी दखल के कारण मौसम का चक्र पूरी तरह बिगड़ चुका है। दुनिया भर में अकेले कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 37-40 अरब टन तक पहुंच चुका है। अमोनिया का स्तर भी 10-12 अरब टन के पार जा चुका है जबकि फ्लोरिनेटेड कार्बन, जो वातावरण में हर साल 1-2 अरब टन फ्लोरिनेटेड कार्बन तेजी से घुल रहा है। इन सभी कारणों की वजह से दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग और मौसम चक्र में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। इस दुनिया में जब सभी खुली हवा में सांस लेना और साफ पीना चाहते हैं तो प्रकृति के प्रति जवाबदेही भी सभी की बनती है।
उन्होंने एक रिपोर्ट साझा करते हुए चेतावनी दी कि इस बढ़ते तापमान का सबसे बड़ा असर हमारी धरती के दो-तिहाई हिस्से यानी समुद्रों पर पड़ रहा है। समुद्रों के तपने से अनियंत्रित वाष्पीकरण हो रहा है, जिससे कहीं अचानक बाढ़ आ रही है तो कहीं गंभीर सूखा पड़ रहा है।
डॉ जोशी ने बताया कि आम जनता तक इस गंभीर विषय को पहुंचाने के लिए लगातार हिंदी और क्षेत्रीय समाचार पत्रों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
सभी हितधारकों ने उपभोक्ता-आधारित जलवायु संबंधी कार्यवाही के लिए व्यावहारिक रणनीतियों और इसे कानूनी व सामाजिक रूप से लागू करने के तरीकों पर अपने विचार साझा किए। इस मौके पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिन डॉ सच्चिदानंद जोशी, पर्यावरणविद, न्यायपालिका से जुड़े विधि विशेषज्ञ, समाजशास्त्री और सामुदायिक नेतृत्वकर्ता सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
उल्लेखनीय है कि कार्बन फुटप्रिंट किसी व्यक्ति, संस्था, उत्पाद या देश की गतिविधियों द्वारा वायुमंडल में छोड़ी जाने वाली कुल ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा का माप है। इसे ‘कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य’ के रूप में मापा जाता है।

