भारतीय सभ्यता की मूल भावना को आदिवासी समाज ने रखा है जीवंत:कुलपति
-एमजीसीयू में जनजातीय गौरव दिवस पर शैक्षणिक विमर्श का आयोजन
पूर्वी चंपारण। महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के उपलक्ष्य में जनजातीय गौरव दिवस का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य जनजाती नायकों के योगदान को स्मरण करना तथा उनके सामाजिक-सांस्कृतिक विचारों को समकालीन संदर्भों में समझना था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने की, उन्होंने वर्चुअल माध्यम से अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में गांधी परिसर के निदेशक एवं चीफ प्रॉक्टर प्रो. प्रसून दत्त सिंह, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज़ के डीन प्रो. सुजीत कुमार चौधरी, समाजशास्त्र विभाग की सहायक आचार्या डॉ. स्वेता, हिंदी विभाग की डॉ. गरिमा तिवारी और डॉ. अल्पिका त्रिपाठी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक (म.प्र.) के अर्थशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. रक्षादेवी सिंह तथा सिदो-कान्हू-बिरसा विश्वविद्यालय, पुरुलिया (पश्चिम बंगाल) के डॉ. सुदीप भुई, एसोसिएट प्रोफेसर, मानवशास्त्र एवं जनजातीय अध्ययन विभाग शामिल थे।अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि आदिवासी समाजों ने भारतीय सभ्यता की मूल भावना सादगी, साझेदारी और प्रकृति संरक्षण को आज भी जीवित रखा है।
भगवान बिरसा मुंडा द्वारा उत्पन्न राजनीतिक चेतना ने स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रवाद की धारा को नई दिशा दी।
उन्होंने समाजशास्त्र एवं सामाजिक कार्य विभाग से आग्रह किया कि वे जनजातीय समुदायों की कॉस्मोलॉजी, जीवन-दृष्टि, ज्ञान-परंपराओं और स्थानीय संसाधन प्रबंधन तकनीकों का दस्तावेजीकरण करें। उन्होने पश्चिमी प्रतिमानों के बजाय भारतीय समाज-आधारित कार्यप्रणाली विकसित करने पर उन्होंने बल दिया। मुख्य अतिथि प्रो. रक्षादेवी सिंह ने भगवान बिरसा मुंडा के युवा नेतृत्व को आज के भारत के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उलगुलान किसी सत्ता, धन या प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए था। उनके अनुसार यह आंदोलन पर्यावरणीय न्याय, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक था।
उन्होंने कहा कि जनजातीय इतिहास में अनेक महिलाएँ महत्वपूर्ण योगदान देती रही हैं, जिनमें पद्मश्री राजमोेनी देवी (छत्तीसगढ़, गोंड समुदाय) और झुनकी देवी (झारखंड) जैसी व्यक्तित्व शामिल है, उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में जनजातीय अध्ययन के लिए फील्ड-वर्क आधारित शोध, मौखिक इतिहास और सांस्कृतिक अभिलेखागारों का निर्माण समय की माँग है।
विशिष्ट अतिथि डॉ. सुदीप भुई ने कहा कि बिरसा मुंडा केवल एक प्रतिरोध के प्रतीक नहीं थे, बल्कि वे आध्यात्मिक नेतृत्व के धनी थे। उनके ‘सन्डे स्कूल्स’ जंगलों में सामाजिक चेतना और सामूहिक नैतिक शक्ति के विकास का माध्यम बने। उन्होंने जनजातीय समाज में धर्म सुधार, सामुदायिक एकता और औपनिवेशिक-मिशनरी हस्तक्षेप के प्रतिरोध को संगठित किया।
उन्होंने कहा कि प्रकृति उपासना, सामुदायिक आत्मविश्वास और सांस्कृतिक पुनर्स्थापन आज के सामाजिक अध्ययनों में विशेष महत्व रखते हैं। वही प्रो. प्रसून दत्त सिंह ने कहा कि प्रकृति पूजा और जनजातीय सांस्कृतिक परंपराएँ भले आधुनिक विकासवाद की धारणाओं से दूर प्रतीत हों, किंतु वे मानव मूल्यों और पर्यावरणीय स्थिरता की मजबूत नींव हैं। उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा की परंपरा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मूल भाव से गहरे रूप से जुड़ी हैं।
प्रो. सुजीत कुमार चौधरी ने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे जनजातीय नेताओं के जीवन, संघर्ष और समुदायों की जीवन-दुनिया को गहराई से समझें, क्योंकि वे आज के वैश्वीकरण काल में वैकल्पिक ज्ञान प्रणालियों का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. स्वेता ने की। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन तथा राष्ट्रगान के साथ हुआ।

