कांग्रेस ने जीडीपी के आंकड़े पर उठाए सवाल, चार साल में 43 लाख करोड़ रुपये की कटौती का दावा

कांग्रेस ने जीडीपी के आंकड़े पर उठाए सवाल, चार साल में 43 लाख करोड़ रुपये की कटौती का दावा
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नई दिल्ली। कांग्रेस महासचिव और संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने अप्रैल-जून 2026 तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की 7.8 प्रतिशत वृद्धि के सरकारी आंकड़े पर सवाल उठाते हुए कह कि नए आंकड़ों और गणना पद्धति की गहन समीक्षा की जरूरत है।उन्होंने दावा किया कि नई श्रृंखला के तहत पिछले चार वित्त वर्षों के जीडीपी आंकड़ों में कुल 43 लाख करोड़ रुपये की कमी की गई है और सरकार को इसका विस्तृत स्पष्टीकरण देना चाहिए।

रमेश ने गुरुवार को जारी आधिकारिक बयान में कहा कि सरकार अप्रैल-जून 2026 तिमाही में अर्थव्यवस्था की 7.8 प्रतिशत वृद्धि को उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है, लेकिन जिस आधार पर यह आंकड़ा तैयार किया गया है, उसे देखने पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। वृद्धि दर की गणना के लिए पिछले वर्ष की समान तिमाही के जीडीपी आंकड़े को आधार बनाया जाता है और अप्रैल-जून 2025 के आंकड़े में कई बार संशोधन किया गया है।

उन्होंने दावा किया कि अप्रैल-जून 2025 की जीडीपी करीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर लगभग 80 लाख करोड़ रुपये कर दी गई। आधार आंकड़े में इतनी बड़ी कमी होने से मौजूदा वर्ष की वृद्धि दर स्वतः अधिक दिखाई दे सकती है। उन्होंने पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के आकलन का हवाला देते हुए कहा कि यदि आधार वर्ष के आंकड़े में इतनी बड़ी कटौती नहीं होती तो इस तिमाही की नाममात्र वृद्धि करीब 2.6 प्रतिशत होती, न कि सरकार द्वारा बताई गई 10.3 प्रतिशत।

उन्होंने सरकार से यह बताने की मांग की कि 43 लाख करोड़ रुपये की यह कटौती किन कारणों से हुई और नई पद्धति में ऐसा क्या बदला जिसके कारण पिछले वर्षों के आंकड़ों में इतनी बड़ी संशोधन हुआ। वास्तविक जीडीपी और नाममात्र जीडीपी के बीच का अंतर महंगाई के प्रभाव को दर्शाता है, लेकिन अप्रैल-जून तिमाही में सरकार का जीडीपी डिफ्लेटर करीब 2.5 प्रतिशत रहा। इसके मुकाबले उन्होंने खुदरा महंगाई 3.9 प्रतिशत और थोक महंगाई 9.4 प्रतिशत रहने का दावा किया। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा इस्तेमाल किया गया डिफ्लेटर आम लोगों द्वारा महसूस की जा रही महंगाई से काफी अलग है।

उन्होंने दावा किया कि इस अंतर के कारण 7.8 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि दर पर भी सवाल खड़े होते हैं। उनके अनुसार, यदि महंगाई को मापने के लिए अधिक वास्तविक आधार इस्तेमाल किया जाए तो वृद्धि दर काफी कम हो सकती है। रमेश ने विनिर्माण और निजी खपत के आंकड़ों को भी अर्थव्यवस्था की कमजोरी का संकेत बताया। उन्होंने सुभाष चंद्र गर्ग के आकलन का हवाला देते हुए कहा कि नई गणना के अनुसार विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन पिछले वर्ष की तुलना में 5.2 प्रतिशत घटा है, जबकि निजी खपत में 5.4 प्रतिशत की कमी आई है।

उन्होंने विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में नरमी और लोगों की क्रय शक्ति पर महंगाई के असर का भी उल्लेख किया।उन्होंने कहा कि जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल पहली बार नहीं उठे हैं। रमेश ने पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम की उन टिप्पणियों का हवाला दिया, जिनमें उन्होंने 2005-11 के दौरान वृद्धि को कम आंके जाने और 2011-12 में आधार वर्ष तथा पद्धति में बदलाव के बाद वृद्धि को लगातार अधिक आंके जाने की बात कही थी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की ओर से 2025 के अंत में भारत के राष्ट्रीय लेखा आंकड़ों को ‘सी’ श्रेणी दिए जाने का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि नई पद्धति तैयार करने की प्रक्रिया क्या थी, इसमें किन विशेषज्ञों और संस्थाओं से परामर्श किया गया तथा महंगाई के प्रभाव को वास्तविक जीडीपी गणना में कम दिखाने वाली डिफ्लेशन पद्धति अपनाने का आधार क्या है?

anand prakash

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