लोकसभा अध्यक्ष ने केंद्रीय विधानसभा की कार्यवाहियों के 89 खंडों के त्रैमासिक पत्रिका ‘विधान-चेतना’ के प्रवेशांक का किया लोकार्पण

लोकसभा अध्यक्ष ने केंद्रीय विधानसभा की कार्यवाहियों के 89 खंडों के त्रैमासिक पत्रिका ‘विधान-चेतना’ के प्रवेशांक का किया लोकार्पण
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नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरुवार को दिल्ली विधानसभा के ऐतिहासिक परिसर में केंद्रीय विधानसभा (1924-1930) की कार्यवाहियों के 89 खंडों और त्रैमासिक पत्रिका ‘विधान-चेतना’ के प्रवेशांक का लोकार्पण किया।उन्होंने कहा कि दिल्ली विधानसभा द्वारा केंद्रीय विधानसभा की 407 ऐतिहासिक बैठकों की कार्यवाहियों को 89 खंडों और 32,376 पृष्ठों में प्रकाशित किया जाना भारत की संसदीय विरासत, लोकतांत्रिक चेतना और संवैधानिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने की अद्वितीय एवं दूरदर्शी पहल है।

यह कार्यक्रम दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता की अध्यक्षता में आयोजित हुआ जिसमें संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू भी शामिल हुए। इस मौक पर दिल्ली के विधायी कार्य मंत्री प्रवेश साहिब सिंह, दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट, विधायक, दिल्ली विश्वविद्यालय के कई प्राध्यापक और शिक्षक मौजूद रहे।

लोकसभा अध्यक्ष ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि पुराने सचिवालय (दिल्ली विधासनभा) की ये दीवारें उन ऐतिहासिक विमर्शों, वैचारिक मंथनों और राष्ट्रनिर्माण के संकल्पों की साक्षी रही हैं, जिनकी गूंज इन अमूल्य कार्यवाहियों और ऐतिहासिक पृष्ठों में आज भी अनुभव की जा सकती है। इन कार्यवाहियों में प्रथम भारतीय अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल का निष्पक्ष अध्यक्षीय नेतृत्व, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की राष्ट्रभक्ति, पंजाब केसरी लाला लाजपत राय का ओजस्वी स्वर, विपिन चंद्र पाल के प्रखर राष्ट्रवादी विचार, माधव श्रीहरि अणे का संवैधानिक चिंतन तथा अनेक महान विभूतियों के वैचारिक मंथन का अमूल्य प्रतिबिंब दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि विट्ठलभाई पटेल ने अध्यक्षीय धर्म, निष्पक्षता, स्वायत्तता और संसदीय मर्यादाओं की जो गौरवशाली परंपरा स्थापित की, वह आज भी लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है।

लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि ‘विधान-चेतना’ जैसी सारगर्भित पहल लोकतांत्रिक विमर्श, संसदीय अध्ययन, शोध और वैचारिक संवाद को नई दिशा प्रदान करेगी। संवाद, तर्क और ज्ञान आधारित चर्चा ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है। विश्वास है कि यह ऐतिहासिक प्रकाशन नई पीढ़ी को अपनी संवैधानिक विरासत, संसदीय परंपराओं और राष्ट्र निर्माण के मूल्यों से जोड़ते हुए भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को और अधिक सशक्त एवं समृद्ध बनाएगा।

anand prakash

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