“मामला लीगल है”: बियॉन्ड रिफॉर्म्स दे रहा एक नई बहस का संकेत -शशि शेखर

“मामला लीगल है”: बियॉन्ड रिफॉर्म्स दे रहा एक नई बहस का संकेत -शशि शेखर
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रवि किशन ने जितना उम्दा अभिनय किया, उतनी ही उम्दा कहानी कह रही है यह नई वेब सीरीज “मामला लीगल है” का सीजन-2. इसके आख़िरी एपिसोड का शीर्षक है बियॉन्ड रिफॉर्म्स. ज्यूडिशियल सिस्टम में सजा देते वक्त किसी केस को रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर मानने का एक आधार बनता है “बियॉन्ड रिफॉर्म्स”. जज की भूमिका में रवि किशन ने नाट्यशास्त्र के शोक, जुगुप्सा, विस्मय, क्रोध जैसे विभिन्न रसों का अद्भुत प्रदर्शन किया है. मुजरिम को फांसी की सजा देते वक्त उनकी विवशता का आधार यही “बियॉन्ड रिफॉर्म्स” जैसी थ्योरी है. लेखक-निर्देशक को इस शानदार काम के लिए बधाई. शायद इसी बहाने फिर से इस पर बात करना जरूरी हो जाता है कि क्या कोई, कोई भी व्यक्ति “बियॉन्ड रिफॉर्म्स” है? दुनिया के किसी भी दंड विधान के तीन ही प्रचलित लक्ष्य है. पहला, सुधार लाना (रिफार्म), दूसरा भय पैदा करना (डेटरेंट) और तीसरा बदला (रिवेंज). दूसरे और तीसरे दंड के पीछे यही तर्क होता है कि अमुक मुजरिम “बियॉन्ड रिफॉर्म्स” है और उसका न रहना या सदा के लिए सलाखों के पीछे रहने में ही समाज की भलाई है. आइये, एक-एक कर के इन तर्कों को देखते हैं.

रिफार्म एक बेसिक चीज है, जिसके आधार पर ज्यादातर सजाएं दी जाती हैं. कुछ और कठोर सजाएं समाज में डेटरेंट स्थापित करने के लिए दी जाती है और रिवेंज अक्सर रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर केसेज के लिए इस्तेमाल होता है, जहान्ब अदालत यह मान लेती है कि मुजरिम “बियॉन्ड रिफार्म” हैं और इसे सजा दे कर पीड़ित को रिवेंज के भाव को संतुष्ट कर दिया जाना चाहिए. तो सवाल उठता है कि जिस रिफार्म के लिए ज्यादातर मुजरिमों को कैद में भेजा जाता है, क्या वे सचमुच रिफार्म हो कर बाहर निकल पाते है?

सच्चाई तो ये है कि भारतीय जेलों में, 2025 के आकड़े के अनुसार, क्षमता से कहीं अधिक, यानी 131 फीसदी कैदी ठूंस-ठूंस कर भरे हुए हैं. देश के करीब 300 जेल अपनी क्षमता से दोगुने कैदियों को संभाले हुए हैं. दिल्ली, बिहार, झाराखंड जैसे जगहों पर यह क्षमता 300 से 500 प्रतिशत अधिक हैं. करीब 75 प्रतिशत अंडरट्रायल कैदी हैं. स्टाफ की भारी कमी रहती है. हर महीने पड़ने वाले रेड से पता चलता है कि जेलों के भीतर क्या हो रहा हैं. मानो, जेल अपराधियों के लिए एक सेफ पैसेज बन गया हो. भारतीय समाज यह मानता रहा है कि जेल एक ऐसी जगह है, जहां आम इंसान भी कुछ दिनों के लिए चला जाए, तो उसके एक खूंखार अपराधी में परिवर्तित हो जाने की संभावना बनी रहती है. ऐसे में, न्याय के “रिफार्म” थ्योरी की प्रासंगिकता कितनी रह जाती हैं, आप खुद सोचिये.

भारतीय परंपरा में तो हमने माना है कि रत्नाकर डाकू रिफार्म हुए, अंगुलिमाल जैसा खूंखार अपराधी रिफार्म हुआ, ऋग्वेद में उल्लेखित ऐलुष नाम के ऋषि को जुआ की भयंकर लत थी, लेकिन आगे चल कर वह समाज को जुआ न खेलने की सलाह देते हैं और. ऋग्वेद के दसवें मंडल में ऋषि ऐलुष ने “अक्षसूक्त” लिखा है, जिसे उनका प्रायश्चित माना जाता है. इसमें उन्होंने समाज को जुआ खेलने के दुष्परिणामों के बारे में चेताया है. आधुनिक भारत में भी लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने चंबल के कितने ही दुर्दांत डाकुओं का हृदय परिवर्तन कराया. 70 के दशक में बिहार के मुशहरी इलाके (मुजफ्फरपुर) में नक्सल हिंसा चरम पर था. जेपी ने गांधीवादी तरीकों से उनका समर्पण कराया. क्या ये सारे के सारे खूंखार डाकू और नक्सली “बियॉन्ड रिफॉर्म्स” थे? या हमें ही (हमारे सिस्टम को) अपराधियों को, समाज को, व्यक्ति को रिफार्म करने का तरीका नहीं मालूम? आखिर इन सवालों पर कौन जवाब देगा? यह बात ठीक है कि जस्टिस सिस्टम और पुलिसिंग व्यवस्था अगर इतने ही मानवीय आधार पर कार्रवाई करने लगे तो फिर शायद ही किसी को सजा मिले?लेकिन, न्याय के डेटरेंट थ्योरी का भी तब क्या मतलब रह जाता है, जब साल 2004 में बलात्कार और हत्या के आरोपी धनञ्जय चटर्जी को फांसी की सजा देने के बाद भी दिल्ली जैसी जगह पर धौला कुआं रेप या फिर दामिनी जैसी दर्दनाक घटनाएं घटती है? गौरतलब है कि इन सभी घटनाओं के आरोपी आर्थिक-सामाजिक-शैक्षणिक रूप से काफी पिछड़े हुए थे. तो यह डेटरेंट (भय) किसके लिए है? समाज के शिक्षित-समझदार-वर्ग के लिए? तो आइये हम ईमानदारी से स्वीकार करें कि हमने अपने समाज के कितने बड़े हिस्से को इतना शिक्षित-सभ्य बना लिया है? दुखद यह भी कि आज अपराध के घिनौने तरीके इजाद करने वालों में ज्यादातर उच्च डिग्रीधारी भी हैं. फिर हमने कैसी शिक्षा व्यवस्था बनाई? यानी, कोई “बियॉन्ड रिफार्म” है, तो इसके लिए पहले किसे दोषी माना जाएं? जो ऐसा है उसे या वो जिस पर इस समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाने की जिम्मेदारी है? केसेज की पेंडेंसी एक ऐसी समस्या है, जिस वजह से “डेटरेंट” आपराधिक प्रवृति वालों के मन को भयाक्रांत नहीं करता. ऐसे ही तो नहीं कहा गया है कि जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड. नीलम कटारा को अपने बेटे के हत्यारे को आजीवन कारावास की सजा दिलाने में 14 साल लग गए. उपहार सिनेमा अग्निकांड में पीड़ित नीलम कृष्णमूर्ति, जिनके दो बच्चों की मौत हो गयी थी, आज भी अदालती फैसले से संतुष्ट नहीं हैं. एक तो अंसल ब्रदर्स को फाइनली सुप्रीम कोर्ट से दोषी करार दिए जाने में 18 साल लग गए और जो सजा मिली भी, उससे शायद ही किसी बिल्डर के मन में “डेटरेंट” पैदा हुआ. देश के स्कूलों, बिल्डिंग्स, फैक्ट्रीज, कोचिंग सेंटर आदि में हर साल आग लगाने की घटनाओं को देखते हुए आप क्या कहेंगे?

अब रिवेंज की बात करते हैं. न्याय के सार्वभौम सिद्धांत (यूनिवर्सल जस्टिस) को देखें तो एक ही जुर्म के लिए दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग सजा का प्रावधान है. जैसे, किसी देश में चोरी के लिए हाथ काटने की सजा, तो किसी देश में मामूली कारावास की सजा. यानी, जस्टिस का नेचर, यूनिवर्सल तो कतई नहीं है. फिर, रिवेंज जैसे कॉमन ह्यूमन बेसिक इंस्टिंक्ट को ये अलग-अलग सजाएं कैसे संतुष्ट करती होंगी? और अगर हम भारत जैसे देश की बात करें, तो हमारे ग्रंथों में कई ऐसे उद्धरण हैं, जो रिवेंज (बदला) के सिद्धांत को सिरे से खारिज करती है. मसलन, महाभारत में उल्लेखित गौतमी नाम की वृद्धा का पुत्र जब सर्पदंश से मर जाता है, तब एक बहेलिया उस सांप को मारने के लिए बाँध लाता है. लेकिन, गौतमी यह कह कर सांप को मारने से मना कर देती है कि क्या इससे मेरा पुत्र जीवित हो जाएगा? यानी, किसी की मौत के बदले किसी को मौत की सजा दे कर एक ख़ास वक्त के लिए पीड़ित के मन को सांत्वना तो दी जा सकती है, लेकिन क्या उसे सचमुच न्याय मिल जाता है? उपहार अग्निकांड में ही हमने देखा कि पीड़ित को न “रिवेंज थ्योरी” का फायदा मिला और न ही “डेटरेंट थ्योरी” काम करता दिखा.

हालांकि, ऐसी स्थिति के लिए न तो पुलिस और न ही अदालतों को जिम्मेवार माना जा सकता है, क्योंकि पुलिस-अदालत का जो सिस्टम निर्मित होता है, उसमें पॉलिटिकल-सोशल सिस्टम का भी योगदान होता है. अकेले न्यायपालिका क्या-क्या करें? हाँ, देश की न्यायपालिका इतनी सक्षम-स्वायत्त-स्वतंत्र जरूर है, जिससे कि वह सजा देने में इस्तेमाल किये जाने वाले इन तीन स्तंभों, रिफार्म, डेटरेंट और रिवेंज पर पुनर्विचार कर सकें. मुझे लगता हैं, वक्त के साथ इन स्तंभों को प्रतिस्थापित किए जाने की जरूरत हैं. हालांकि, अकेले या उपाय काफी नहीं होगा, जबतक कि समग्र सिस्टम इस पर मिल कर एक साथ काम न करें. भारत ने इस दिशा में काम शुरू किया है. सांगानेर या आंध्र प्रदेश के ओपन जेल बेहतरीन तरीके से काम कर रही हैं. मेरी व्यक्तिगत सोच है कि खूंखार किस्म के अपराधों के अलावा, जितने भी कैदी (सजायाफ्ता) हैं, उन्हें ऐसे ही ओपन जेल में रखा जाना चाहिए. ऐसे कोर्सेज चलाए जाने चाहिए, जो मानसिक रूप से उन्हें मजबूत बना कर सकारात्मक दिशा में ले जाएं. उनके पुनर्वास और शिक्षा की बेहतरीन व्यवस्था जेल के भीतर ही हो. अंडर ट्रायल कैदियों को ले कर भी पालिसी बनाए जाने की जरूरत है. यह सोचने की जरूरत है कि क्या वर्षों तक किसी को अंडरट्रायल रख कर हम अपने ही संसाधनों को कहीं बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं? क्या इनके अपराधों को वर्गीकृत कर के कोई रास्ता निकाला जा सकता है?

अंत में, बदला मिल गया का भाव (रिवेंज) पीड़ित को मिले, न कि इस भाव से सिस्टम जेल के भीतर कैदियों को ठूंस कर अपने कर्तव्यों को समाप्त समझ लें. अन्यथा, “मामला लीगल है” सीजन-2 का एक बड़ा ही शानदार डायलाग और भी है, “जस्टिस डजनॉट एक्जिस्ट, इट इज जस्ट द अब्सेंस ऑफ़ इंजस्टिस.” यानी, जितना कम अन्याय हो, उसे ही न्याय मान लो. जबकि, एक सशक्त राष्ट के तौर पर हमें इससे कहीं आगे जाना है. हमें उस दिन का निर्माण करना हैं, जिस दिन न जस्टिस डिलेड होगा, न डिनाइड. ऐसे शानदार सपने के बीजारोपण के लिए इस वेब सीरिज के लेखक, निर्देशक और कलाकारों का बहुत-बहुत शुक्रिया.

(लेखक फ्रीलांस पत्रकार हैं.)

anand prakash

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