भाजपा की मजबूरी, केजरीवाल क्यों जरूरी? शशि शेखर
केजरीवाल अपने सहयोगियों के साथ शराब नीति घोटाले में आरोप मुक्त हो गए. सीबीआई ने, हालांकि, इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर दी हैं. फिर भी, राउज एवेन्यू कोर्ट का यह फैसला आम आदमी पार्टी के लिए संजीवनी से कम नहीं. अदालती फैसले को अरविंद केजरीवाल ने अपने, अपने सहयोगियों और पार्टी के लिए “कट्टर ईमानदार” जैसा सर्टिफिकेट माना है. हालांकि, मुझे व्यक्तिगत तौर पर “कट्टर” शब्द से आपत्ति रहती है, क्योंकि “कट्टर” आपको किसे इभी विचार के प्रति इतना अधिक दृढ़ बना देता है कि एक समय आप स्वयं के बनाए वैचारिकी में ही उलझ कर रह जाते हैं. बहरहाल, केजरीवाल का शराब नीति घोटाले में फंसना और उससे बरी होना, दोनों ही किसी फंसाने से कम नहीं लगता. बिलकुल एक बुनी-सुनियोजित-प्लांड कहानी की तरह. वैसे भी राजनीति में सब कुछ प्लांड होता है और अगर आपको लगता है कि यह प्लांड नहीं था, तो उसे भी उसी तरह प्लांड किया गया होता है, ताकि आपको लगे कि यह प्लांड नहीं है.
कहानी के दूसरे हिस्से में चलते है. दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद, केजरीवाल और उनके ज्यादातर सहयोगी पंजाब में सक्रिय हो गए. थोड़ा-थोड़ा गुजरात में भी सक्रियता दिखने लगी थी. इनके राज्यसभा सांसद (संजय सिंह को छोड़ कर) किस काम के लिए राज्यसभा भेजे गए हैं, यह शायद केजरीवाल को भी नहीं पता होगा. अलबत्ता, कहानी का दूसरा हिस्सा ये है कि तकरीबन अज्ञातवास जैसी स्थिति के बीच नेशनल अपोजिशन की मुख्य भूमिका पिछले कुछ समय से राहुल गांधी निभा रहे थे. हाल ही में संपन्न हुए सदन के सत्र में भी वे काफी आक्रामक दिखे. सदन के भीतर, सदन के बाहर लगातार राहुल और कांग्रेस, मोदी पर हमलावर हैं. और इस वक्त भारतीय राजनीति में चेहरा देखने और दिखाने के आधार पर ही परसेप्शन बन-बिगड़ रहे हैं. यानी, आप जितना अधिक मीडिया में दिखेंगे, आपकी प्रासंगिकता उतनी बनी रहेगी. अन्यथा, रील्स के जमाने में 2 मिनट बाद किसे याद रहता है कि आपने कब, कौन सा तीर मारा था. और इस सब के बीच गुजरात विधानसभा का चुनाव नजदीक आ गया है. हम अपनी बात आगे बढ़ाए, इससे पहले पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव के आकड़ों का एक विश्लेषण, आम आदमी पार्टी की मौजूदगी के हिसाब से देख लेते हैं.
2022 गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड जीत मिली थी. लेकिन, यह आम आदमी पार्टी को मिले करीब 13 फीसदी वोटों के बिना संभव था? उस चुनाव में आम आदमी पार्टी को 5 सीटें मिली थी. हालांकि, राजनैतिक रूप से उसे इसका कोई विशेष फायदा नहीं हुआ, लेकिन सबसे बड़ा फायदा भाजपा अको जरूर हुआ. नुकसान किसका, इसका आकलन आसानी से किया जा सकता है, जहाँ कांग्रेस को सिर्फ 17 सीटों और 27 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा था, जबकि इससे ठीक पहले, यानी 2017 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 77 सीटें और 41 फीसदी वोट मिले थे. अब कांग्रेस के पिछले विधानसभा चुनाव के 27 फीसदी वोट में आम आदमी पार्टी के 13 फीसदी वोट को मिला डेम, तो वह करीब 40 फीसदी, यानी 2017 में कांग्रेस द्वारा हासिल वोट प्रतिशत के बराबर हो जाता है. उम्मीद है, समीकरण यहाँ जा कर क्लियर हो गया. 2017 का गुजरात विधानसभा चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा था. कांग्रेस ने 35 सालों का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था. प्रधानमंत्री मोदी को सी-प्लेन तक गुजरात में उतारना पड़ा था.
यानी, गुजरात में आप की जरूरत भाजपा को है. लेकिन, यह मजबूरी यहीं ख़त्म नहीं होती. राष्ट्रीय स्तर पर भी, जैसा कि ऊपर जिक्र है, इन दिनों राहुल गांधी विपक्ष के प्रोमिनेंट फेस बने हुए हैं. वे असहज सवाल कर रहे हैं. राहुल के बरक्स, केजरीवाल असहज सवाल नहीं करते. वे राजनीतिक रूप से काफी सहज माने जाने वाले सवालों को ले कर आक्रामक होते हैं. इन सवालों से सरकार को या प्रधानमंत्री के फेस वैल्यू को कोई नुकसान होने की संभावना नहीं रहती हैं. और सबसे अहम् यह भी कि एक राजनीतिक दल होने के नाते, आम आदमी पार्टी का यह विशेषाधिकार है कि वह अपना विस्तार करें. जैसे वह दिल्ली से निकल कर पंजाब पहुँची, अब वह निश्चित ही गुजरात, गोवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे उन राज्यों में की एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनना चाहेगी, जहाँ भाजपा बनाम कांग्रेस है. यानी, तीसरे विकल्प के तौर पर आम आदमी पार्टी के लिए काफी जगह हैं इन राज्यों में. और यह भी सर्वविदित है कि भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत चाहती है, तो भाजपा के इस महायज्ञ में अगर किसी की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है, तो वह केजरीवाल ही है. इस वक्त, उनके अलावा ऐसा कोई भी क्षेत्रीय क्षत्रप नहीं दिख रहा है, जो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके. ले दे कर बचते हैं, राहुल गांधी ही. ऐसे में कांग्रेस के सर्वमान्य चेहरे के तौर पर राहुल गांधी को रोकना भी भाजपा की प्राथमिकता है और उसके इस काम में अरविन्द केजरीवाल से बड़ा मददगार कोई नहीं हो सकता.
विपक्ष के खाले पड़े स्पेस में ही अभी वर्चस्व की लड़ाई होनी है. हरियाणा चुनाव के समय भी ऐसा ही दिखा, जब इंडिया गठबंधन तो था, लेकिन आम आदमी पार्टी और ओवर कान्फिडेंस की शिकार कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ कर, भाजपा को हरियाण गिफ्ट में दे दिया था. राहुल गांधी अपने लालच में इतने अधिक भ्रमित हो चुके हैं कि उन्होंने नीतीश कुमार जैसे चतुर राजनीतिज्ञ को भी इंडिया गठबंधन से किनारे कर दिया. लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह नीतीश कुमार विपक्ष की धुरी बन चुके थे, लोकसभा चुनाव का परिणाम कुछ और भी हो सकता था. लेकिन, राहुल गांधी ने खुद की छवि, खुद की महत्वाकांक्षा के कारण नीतीश कुमार को अलग होने पर मजबूर कर दिया. ठीक वहीं रवैया केजरीवाल के साथ भी कांग्रेस का दिखा. दिल्ली में खोई जमीन वापिस पाने के लिए कांग्रेस ने संदीप दीक्षित तक को नई दिल्ली से मैदान में उतार दिया और केजरीवाल उतने ही वोट से हारे, जितने वोट संदीप दीक्षित को मिले थे.
ऐसी स्थिति में, आम आदमी पार्टी या अरविन्द केजरीवाल ने कोई कसम तो खाई नहीं है कि चाहे जो हो जाए, मोदी विरोध के नाम पर वे कांग्रेस को किसी भी कीमत पर ढोते रहेंगे. अरविन्द केजरीवाल को भी पता है कि लंबे समय तक टिके रहने के लिए तात्कालिक लाभ का कोई महत्व नहीं. अब वे पाक-साफ हो कर, फिर से “कट्टर” ईमानदारी का प्रमाणपत्र ले कर आए हैं. निश्चित ही वे पहले से अधिक आक्रामक दिखेंगे. दिखना भी चाहिए. क्योंकि सामने पंजाब का चुनाव भी हैं, जहाँ उनका सामना मुख्य रूप से कांग्रेस से ही है. फिर गुजरात भी है, जहाँ आम आदमी पार्टी के पास खुद का कुछ खोने के लिए बहुत कुछ नहीं है, लेकिन कांग्रेस का सूपड़ा एक बार फिर से साफ़ करने लायक बहुत कुछ है. तो, दुश्मन का दुश्मन, दोस्त होता है. भले तात्कालिक हो. और यह बात मैं गारंटी से कहा सकता हूँ कि अरविन्द केजरीवाल इस दौर के सबसे अनप्रेडिक्टेबल लीडर हैं. भाजपा भी अगर उन्हें टेकेन फॉर ग्रांटेड लेने की सोचें, तो गच्चा ही खाएगी. कईयों को बड़ी उम्मीद थी कि अरविन्द केजरीवाल रामलीला मैदान से सीधे अपने कौशांबी स्थित घर चले जाएंगे. लेकिन, वे सीधे मुख्यमंत्री हाउस पहुँच गए और ऐसे पहुंचे कि 12 साल तक भाजपा को दिन में तारे दिखते रहे. बहरहाल, “कट्टर ईमानदार” सर्टिफिकेट फिर से मिलने पर, अरविंद केजरीवाल को बधाई.
लेखक स्वतंत्र पत्रकार है

