भारत की शिक्षा व्यवस्था को स्वतंत्र करने के साथ ही परीक्षाओं को निजी संस्थाओं से मुक्त करना जरूरी: राहुल

भारत की शिक्षा व्यवस्था को स्वतंत्र करने के साथ ही परीक्षाओं को निजी संस्थाओं से मुक्त करना जरूरी: राहुल
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देहरादून। लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि भारत की शिक्षा को स्वतंत्र किए जाने के साथ ही परीक्षाओं को निजी संस्थाओं से भी मुक्त किया जाना बेहद जरूरी है।परीक्षाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखते हुए भर्ती परीक्षाओं के संचालन की जिम्मेदारी निजी कंपनियों के बजाय सरकार के पास रहनी चाहिए, क्योंकि परीक्षा प्रणाली का उद्देश्य सार्वजनिक विश्वास बनाए रखना है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि पेपर लीक के मामलों में दोषियों के खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए और यदि किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है तो प्रभावित अभ्यर्थियों के लिए समयबद्ध पुनर्परीक्षा, आवश्यक आर्थिक सहायता और अन्य राहत उपाय भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

राहुल गांधी ने यह बात आज देर शाम देहरादून के बन्नू स्कूल मैदान में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम में कही। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यर्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों से संवाद करते हुए कहा कि विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट, उद्यमिता के लिए ऋण प्राप्त करने में कठिनाई, कॉरपोरेट क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एआई के बढ़ते प्रभाव और सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियों में कमी के कारण सरकारी नौकरी आज करोड़ों युवाओं के लिए सबसे बड़ा विकल्प बन गई है। ऐसे में पेपर लीक जैसी घटनाएं उनकी वर्षों की मेहनत और उम्मीदों को नष्ट कर देती हैं। यही वजह है कि भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली लगातार बढ़ती जा रही है। आलम यह है कि ईमानदारी से आठ से दस घंटे लगातार पांच साल तक पढ़ने और 9 लाख तक कोचिंग पर खर्च करने के बाद छात्र परीक्षा देते हैं और ऐसे में पेपर लीक उनके सपनों को चकनाचूर कर देता है। 150 परीक्षार्थियों में से मात्र एक परीक्षार्थी को सफलता मिलती है।उन्होंने कहा कि मध्यम वर्गीय व गरीब अभ्यर्थी मेहनत से पढ़ता लेकिन नीट के पेपर का चालीस लाख, लेखपाल व बिहारी शिक्षक परीक्षा का पेपर 15-15 लाख व सब इंस्पेक्टर के पेपर का 10 लाख में सौदा किया जाता है। ऐसे ही सौदे अन्य परीक्षाओं के पेपरों का भी होता है। ऐसे में परीक्षार्थी आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं, जो दुर्भाग्य है। सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले अधिकांश छात्र मध्यम वर्गीय और गरीब परिवारों से आते हैं। उनके माता-पिता वर्षों तक त्याग करते हैं, कर्ज लेते हैं और बच्चों की तैयारी पर बड़ी राशि खर्च करते हैं। उन्होंने दावा किया कि एक अभ्यर्थी की पांच वर्ष की तैयारी पर औसतन करीब नौ लाख रुपये का खर्च आता है।

नेता प्रतिपक्ष ने छात्राें से किया संवाद

कार्यक्रम के दौरान उत्तराखंड सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही कंचना जोशी, आरती भंडारी, नीट अभ्यर्थी कनिष्क कांडपाल व बिहार गया के आशुतोष यादवप ने अपने अनुभव साझा किए। छात्रों ने कहा कि वर्षों की तैयारी के बावजूद बार-बार प्रश्नपत्र लीक होने, परीक्षाएं निरस्त होने और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी से उनका मनोबल टूटता है। छात्रों ने कहा कि परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद वे लगातार तैयारी करते हैं, लेकिन व्यवस्था की खामियों का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है।

मंच पर पर बेटी काे याद करते हुए राे पड़े रिया के पिता

कार्यक्रम में 3 मई को नीट परीक्षा को निरस्त किए जाने से आहत होकर आत्महत्या करने वाली देहरादून की रिया कुमारी के पिता राजेश सिंह राेते हुए अपनी बात साझा की। उन्होंने बताया कि परीक्षा के बाद प्रश्नपत्र लीक होने की सूचना मिलने से उनकी बेटी गहरे मानसिक तनाव में चली गई थी। उन्होंने कहा कि वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा की अनिश्चितता ने उसे तोड़ दिया। उन्होंने राहुल से परीक्षाओं में पारदर्शिता, सुचिता और पेपर लीक करने वाले वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। कहा कि वे संसद में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने के साथ ही ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर रोक के लिए पूरी ताकत से कार्य करें।

राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर बननी चाहिए सर्वदलीय सहमति

राहुल गांधी ने कार्यक्रम में शामिल छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, विश्वसनीयता और निष्पक्षता बहाल करने के लिए व्यापक सुधार आवश्यक हैं और कांग्रेस इस मुद्दे को संसद और देशभर में लगातार उठाती रहेगी। उन्होंने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य, उनके परिवारों के त्याग और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है। उन्होंने कहा कि यह केवल परीक्षा प्रणाली की तकनीकी खामी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का गंभीर मुद्दा है, जिसके समाधान के लिए राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सर्वदलीय सहमति बनाई जानी चाहिए।

anand prakash

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