भोपाल से दिल्ली भेजे गए भगवान बुद्ध के परम शिष्यों के अस्थि कलश, सांची में दिया गया गार्ड ऑफ ऑनर

भोपाल से दिल्ली भेजे गए भगवान बुद्ध के परम शिष्यों के अस्थि कलश, सांची में दिया गया गार्ड ऑफ ऑनर
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रायसेन। मध्य प्रदेश के रायसेन जिला मुख्यालय स्थित विश्व धरोहर बौद्ध तीर्थ सांची से गुरुवार को भगवान गौतम बुद्ध के परम शिष्यों अरिहंत सारिपुत्र और महामोद्ल्यायन के पवित्र अस्थि कलश विशेष विमान से दिल्ली भेजे गए।इससे पहले सांची में इन अस्थि कलश को सशस्त्र सुरक्षा बलों ने ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया।

सांची के चैतियगिरी विहार मंदिर के मुख्य तहखाने से सुबह 13 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी में अस्थि कलशों को बाहर निकाला गया। इसके बाद बौद्ध भिक्षुओं ने करीब डेढ़ घंटे तक मंत्रोच्चार के साथ विशेष पूजा-अर्चना की। सशस्त्र सुरक्षा बलों के ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिए जाने के बाद कलशों को बुलेटप्रूफ और शॉक-प्रूफ विशेष बॉक्स में सील कर भोपाल से रवाना किया गया।

अस्थि कलशों को कड़ी सुरक्षा के बीच सड़क मार्ग से भोपाल एयरपोर्ट लाया गया, जहां से विशेष विमान के जरिए इन्हें दिल्ली भेजा गया है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मध्य प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल और वानगल उपतिस नायक थेरो, रायसेन कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा, पुलिस अधीक्षक आशुतोष गुप्ता और भारत सरकार के संस्कृति विभाग के निदेशक यश सक्सेना सहित कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे।

इस अवसर पर मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में यह नई परंपरा शुरू हुई है। पहले ये अस्थियां विदेशों में थीं, जिन्हें भारत लाया गया और अब सम्मानपूर्वक दर्शन के लिए विभिन्न देशों में भेजा जा रहा है। वहीं, महाबोधि सोसायटी श्रीलंका के प्रमुख वानगल उपतिस नायक थेरो ने कहा कि भारत की इस अमूल्य विरासत के मंगोलिया पहुंचने से दोनों देशों के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंध मजबूत होंगे। इससे सांची में विदेशी पर्यटकों की संख्या में भी वृद्धि होगी।

दरअसल, भगवान गौतम बुद्ध के दोनों परम शिष्यों अरिहंत सारिपुत्र और महामोद्ल्यायन के पवित्र अवशेषों को मंगोलिया भेजा जा रहा है। भोपाल एयरपोर्ट पर गरिमामय विदाई समारोह के बाद अवशेषों को दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय भेज दिया गया है। यहां तकनीकी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 29 मई को इन्हें मंगोलिया ले जाया जाएगा। यह दूसरी बार है, जब इन अवशेषों को दर्शन के लिए विदेश भेजा जा रहा है, इससे पहले इन्हें दो साल पहले थाईलैंड भेजा गया था। मंगोलिया भेजने से पहले इन्हें दिल्ली में दर्शनार्थ रखा जाएगा।

रायसेन एसडीएम मनीष शर्मा ने बताया कि केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की विशेष टीम ने सांची में कलशों का भौतिक सत्यापन और वैज्ञानिक जांच की। इस प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराकर पंचनामा भी तैयार किया गया। इन पवित्र अवशेषों को हमेशा राजकीय अतिथि का दर्जा दिया जाता है और पूरी यात्रा के दौरान ये 24 घंटे सशस्त्र सुरक्षा घेरे में रहते हैं। कलशों को स्मार्ट क्लाइमेट कंट्रोल केस में रखा जाता है। सुरक्षा कारणों से यात्रा का रूट पूरी तरह गोपनीय रहता है और एडवांस पायलट वाहन साथ चलता है।

मप्र के संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के अपर मुख्य सचिव शिव शेखर शुक्ला ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशेष पहल पर सांची स्तूप से भगवान बुद्ध के परम शिष्य अरिहंत सारिपुत्र और महामोद्ल्यायन के पवित्र अवशेष सार्वजनिक दर्शन के लिये मंगोलिया भेजे जा रहे हैं। यह पहल संस्कृति मंत्रालय (भारत सरकार), पर्यटन और संस्कृति, महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया और इंटरनेशनल बौद्ध कन्फेडरेशन (आईबीसी) के संयुक्त समन्वय से आयोजित की जा रही है।

एसीएस शुक्ला ने बताया कि नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में 29 मई को पवित्र अवशेषों को सार्वजनिक दर्शन के लिए रखा जाएगा। यहां ‘महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया’ के पूज्य भिक्षु पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना करेंगे।

मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में 31 मई को पवित्र अवशेषों का होगा सार्वजनिक दर्शन

एसीएस शुक्ला ने बताया कि मंगोलिया की राजधानी उलानबातर में 31 मई 2026 से शुरू होने वाली यह प्रदर्शनी अनुमानित रूप से 10 लाख से अधिक श्रद्धालुओं, भिक्षुओं और पर्यटकों को आकर्षित करेगी। इससे भारत के बौद्ध तीर्थ सर्किट, विशेषकर सांची जैसे स्थलों में वैश्विक रुचि बढ़ेगी और मंगोलिया की अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ाव भी और मजबूत होगा। भारत की बौद्ध विरासत को मंगोलिया जैसे बौद्ध परंपरा से जुड़े देश में ले जाकर यह भारत की “बौद्ध धर्म की जन्मभूमि” के रूप में भूमिका को और सशक्त करती है तथा अंतरराष्ट्रीय तीर्थ पर्यटन को बढ़ावा देती है।

शुक्ला ने कहा कि मध्य प्रदेश के लिए यह वैश्विक मंच पर अपने बौद्ध सर्किट को स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिससे विदेशी पर्यटकों की संख्या, प्रवास अवधि और सांस्कृतिक सहभागिता में वृद्धि होगी। यह पहल दोनों देशों के मठों, सांस्कृतिक संस्थानों और संग्रहालयों के बीच निरंतर सहयोग के नए मार्ग भी खोलेगी, जिससे साझा विरासत पर आधारित दीर्घकालिक सांस्कृतिक संबंध विकसित होंगे।

सांची स्तूप: यूनेस्को विश्व धरोहर और आस्था का वैश्विक केंद्र

यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल ‘सांची स्तूप’ विश्व के सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन बौद्ध स्थलों में से एक है। यहाँ संरक्षित पवित्र अवशेषों को भगवान बुद्ध के प्रतीक स्वरूप अत्यंत श्रद्धा और पूजनीय भाव से देखा जाता है। भगवान बुद्ध के दो प्रमुख शिष्य सारिपुत्र और महामोद्गल्यायन थे, जिन्हें बुद्ध का अग्र युग्म माना जाता था। सारिपुत्र को प्रज्ञा (बुद्धिमत्ता) में और मौद्गल्यायन को अलौकिक शक्तियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। दोनों ही शिष्य बौद्ध संघ के अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ थे और उन्होंने धम्म के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई। इनकी शिक्षाएँ आज भी बौद्ध दर्शन और साधना परंपरा में अत्यंत सम्मान के साथ स्मरण की जाती हैं। विशेष बात यह है कि सांची के 30 किमी के दायरे में कई ऐसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल मौजूद हैं, जो भगवान बुद्ध की शिक्षाओं की गूंज आज भी संजोए हुए हैं।

anand prakash

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