मंडुवा-रागी से मिलेट्स तक, स्थानीय अनाजों में सेहत की राह तलाश रहा राष्ट्रीय पोषण संस्थान
-रागी-मिलेट्स उपयोगी, लेकिन संतुलित थाली जरूरी
-उत्तराखंड के पारंपरिक अनाजों पर भी हो रहा शोध- -बचपन से विकसित हों स्वस्थ खान-पान की आदतें
हैदराबाद। भारत में पोषण की बदलती तस्वीर ने वैज्ञानिकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी है।एक ओर अल्पपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी चिंता का विषय बनी हुई है, तो दूसरी ओर बदलती जीवनशैली, कम शारीरिक सक्रियता और अधिक कैलोरी, नमक, चीनी और वसा वाले खाद्य पदार्थों के बढ़ते सेवन से मोटापा और गैर-संचारी रोगों का बोझ बढ़ रहा है।
इस दोहरी पोषण चुनौती के बीच पारंपरिक और स्थानीय अनाजों को आधुनिक पोषण विज्ञान से जोड़कर स्वस्थ आहार के विकल्प तलाशे जा रहे हैं। हैदराबाद स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पोषण संस्थान (आईसीएमआर-एनआईएन) में मिलेट्स, रागी और विभिन्न स्थानीय खाद्य पदार्थों पर चल रहे शोध इसी प्रयास का हिस्सा हैं।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी), देहरादून की ओर से आयोजित पांच दिवसीय हैदराबाद प्रेस दौरे के दूसरे दिन उत्तराखंड के 15 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने आईसीएमआर-एनआईएन का भ्रमण किया। वैज्ञानिकों ने पत्रकारों को संस्थान में चल रहे पोषण अनुसंधान, खाद्य पदार्थों की पोषण गुणवत्ता के आकलन, जन स्वास्थ्य शिक्षा और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर आहार संबंधी दिशा-निर्देश तैयार करने में संस्थान की भूमिका से अवगत कराया।
आईसीएमआर-एनआईएन की निदेशक डॉ भारती कुलकर्णी ने कहा कि देश में पोषण संबंधी नीतियों और आहार संबंधी दिशा-निर्देशों को वैज्ञानिक प्रमाणों से मजबूत करना संस्थान के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। उन्होंने खाद्य पदार्थों की संरचना, पोषक तत्वों की आवश्यकताओं और विभिन्न आयु वर्गों के लिए संतुलित आहार की जरूरत पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि संस्थान की ओर से तैयार इंडियन फूड कंपोजिशन टेबल्स में देश में उपलब्ध विभिन्न खाद्य पदार्थों में ऊर्जा, प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्वों और खनिजों की जानकारी संकलित की गई है। यह जानकारी शोधकर्ताओं, खाद्य उद्योग और जन स्वास्थ्य नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराती है। इसी तरह भारतीयों के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकताओं और अनुशंसित आहार संबंधी मानकों का निर्धारण अलग-अलग आयु वर्ग और शारीरिक अवस्थाओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
उत्तराखंड के लिए आईसीएमआर-एनआईएन का शोध विशेष महत्व रखता है। डॉ कुलकर्णी ने बताया कि राज्य में पारंपरिक रूप से उपयोग किए जाने वाले मंडुआ, झंगोरा, चौलाई और कोदा जैसे स्थानीय कृषि उत्पादों एवं मोटे अनाजों के विशिष्ट पोषक तत्वों का अध्ययन किया जा रहा है। इसके साथ ही रागी यानी फिंगर मिलेट के सेवन का एनीमिया पर संभावित प्रभाव समझने के लिए विश्लेषणात्मक अध्ययन भी किए जा रहे हैं।

मंडुआ और झंगोरा जैसे अनाज उत्तराखंड की पारंपरिक पहाड़ी थाली का हिस्सा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध इन खाद्य पदार्थों को आधुनिक वैज्ञानिक कसौटियों पर परखने से न केवल इनके पोषण मूल्य को समझने में मदद मिल सकती है, बल्कि स्थानीय खाद्य परंपराओं और विविधतापूर्ण आहार को भी नई वैज्ञानिक दृष्टि मिल सकती है। हालांकि विशेषज्ञ किसी एक खाद्य पदार्थ को संपूर्ण स्वास्थ्य का विकल्प मानने के बजाय संतुलित और विविध आहार में उसके उचित उपयोग पर जोर दे रहे हैं।
डॉ कुलकर्णी ने कहा कि स्वस्थ खान-पान की आदतों का विकास जीवन के शुरुआती वर्षों से ही किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के आहार में अतिरिक्त चीनी से बचने संबंधी दिशा-निर्देश का उल्लेख किया। विशेषज्ञों के अनुसार छह माह की उम्र के बाद स्तनपान के साथ पूरक आहार शुरू करते समय भोजन में विविधता, पर्याप्त मात्रा और उचित आवृत्ति सुनिश्चित करना जरूरी है।
बच्चों के भोजन में केवल पेट भरने के बजाय आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। अत्यधिक मीठे पेय और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की जगह स्थानीय एवं पौष्टिक खाद्य विकल्पों को प्राथमिकता देने से बचपन में पोषण संबंधी जरूरतें पूरी करने के साथ भविष्य में मोटापा और जीवनशैली से जुड़े रोगों के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
कुपोषण से आगे बढ़ी पोषण की चुनौती:
डॉ कुलकर्णी ने कहा कि भारत में पोषण की चुनौती अब केवल भोजन की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा में अंतर है। किसी व्यक्ति को पर्याप्त भोजन उपलब्ध होना अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करता कि उसे सभी जरूरी पोषक तत्व मिल रहे हैं। इसके लिए आहार में विविधता और खान-पान के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव भी आवश्यक हैं।
उन्होंने बच्चों में बढ़ते अधिक वजन और मोटापे की समस्या का उल्लेख करते हुए निष्क्रिय जीवनशैली तथा वसा, नमक और चीनी की अधिक मात्रा वाले खाद्य पदार्थों के अत्यधिक सेवन को इसके प्रमुख कारणों में बताया। ऐसे में पोषण नीति के सामने एक साथ अल्पपोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और जीवनशैली से जुड़े चयापचय संबंधी विकारों से निपटने की चुनौती है।
प्रतिनिधिमंडल ने पोषण सूचना, संचार एवं स्वास्थ्य शिक्षा प्रभाग के प्रमुख एवं वैज्ञानिक-जी डॉ सुब्बा राव के तकनीकी सत्र में भी भाग लिया। उन्होंने पोषण संबंधी वैज्ञानिक जानकारी और आम लोगों की रोजमर्रा की खान-पान की आदतों के बीच मौजूद अंतर को पाटने में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि खाद्य पदार्थों और पोषण को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां मौजूद हैं। ऐसे में मीडिया को प्रमाण-आधारित जानकारी को प्राथमिकता देते हुए जिम्मेदार पत्रकारिता के माध्यम से लोगों तक वैज्ञानिक तथ्यों को पहुंचाना चाहिए। सही जानकारी के प्रसार से लोगों को अपने भोजन और जीवनशैली से जुड़े बेहतर निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।
एनआईएन में मिलेट्स और रागी जैसे अनाजों की पोषण संरचना और स्वास्थ्य की दृष्टि से उनकी उपयोगिता का अध्ययन किया जा रहा है। शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू यह समझना है कि पारंपरिक खाद्य पदार्थों को संतुलित आहार में किस तरह और उचित मात्रा में शामिल किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार रागी और अन्य मिलेट्स पोषक तत्वों के उपयोगी स्रोत हो सकते हैं, लेकिन इन्हें संपूर्ण आहार का विकल्प नहीं माना जा सकता। स्वस्थ भोजन में अनाज और दालों के साथ सब्जियां, फल, दूध एवं अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों की पर्याप्त विविधता जरूरी है। भोजन की मात्रा के साथ नियमित शारीरिक गतिविधि भी स्वस्थ जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फैटी एसिड से खाद्य गुणवत्ता तक शोध:
पत्रकारों ने संस्थान की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं का भी भ्रमण किया। शोधकर्ताओं ने खाद्य विश्लेषण और लिपिड रसायन विज्ञान में किए जा रहे अनुसंधान की जानकारी दी। फैटी एसिड के विश्लेषण के माध्यम से खाद्य पदार्थों में संतृप्त, ट्रांस और अन्य प्रकार की वसा की मात्रा का आकलन किया जाता है।
ऐसे अध्ययन हृदय रोगों सहित गैर-संचारी रोगों के जोखिम को समझने और बेहतर खाद्य विकल्पों की दिशा में वैज्ञानिक आधार तैयार करने में उपयोगी हैं।एनआईएन में बच्चों के पोषण, महिलाओं के आहार, खाद्य गुणवत्ता, खाद्य लेबलिंग और विभिन्न पोषण संबंधी विषयों पर भी शोध किया जा रहा है। प्रयोगशाला आधारित अनुसंधान से प्राप्त प्रमाणों को जन स्वास्थ्य शिक्षा और नीति निर्माण से जोड़ने पर संस्थान विशेष जोर देता है।
स्थानीय खाद्य संस्कृति को विज्ञान से जोड़ने की कोशिश:
भारत की खाद्य संस्कृति उसकी भौगोलिक और कृषि विविधता के अनुरूप अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित हुई है। ऐसे में हर क्षेत्र के लिए एक जैसी भोजन व्यवस्था के बजाय स्थानीय रूप से उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों को संतुलित आहार में शामिल करने की संभावनाओं को समझना महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड के मंडुआ, झंगोरा, चौलाई और कोदा जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ इसी स्थानीय पोषण विविधता का हिस्सा हैं।
मिलेट्स को लेकर बढ़ती वैज्ञानिक रुचि पारंपरिक खाद्य ज्ञान और आधुनिक पोषण विज्ञान के बीच सेतु बनाने का अवसर भी उपलब्ध करा रही है। विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि किसी एक अनाज को चमत्कारी खाद्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसकी पोषण भूमिका को संपूर्ण और संतुलित आहार के संदर्भ में समझाया जाए। यही दृष्टिकोण पोषण सुरक्षा, स्वस्थ जीवनशैली और गैर-संचारी रोगों की रोकथाम की दिशा में अधिक टिकाऊ आधार तैयार कर सकता है।
सालारजंग संग्रहालय का निजी संग्रह से राष्ट्रीय विरासत तक का सफर:
प्रतिनिधिमंडल ने दौरे के दूसरे दिन बुधवार को शहर की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को करीब से जाना। प्रतिनिधिमंडल ने विश्वप्रसिद्ध सालारजंग संग्रहालय का भ्रमण कर यहां संरक्षित दुर्लभ कलाकृतियों, ऐतिहासिक वस्तुओं, पांडुलिपियों और पुस्तकों के बारे में जानकारी प्राप्त की।
सालारजंग संग्रहालय को विश्व के प्रमुख एकल-व्यक्ति कला संग्रहों में शुमार किया जाता है। संग्रहालय में 38 से अधिक दीर्घाओं में 43 हजार से अधिक कलाकृतियां, पांडुलिपियां और पुस्तकें संरक्षित हैं। संग्रहालय की विभिन्न दीर्घाओं में भारत सहित विश्व के-अलग हिस्सों की कला, संस्कृति और इतिहास की झलक देखने को मिलती है।
भ्रमण के दौरान संग्रहालय की 19वीं सदी की ब्रिटिश म्यूजिकल क्लॉक प्रतिनिधिमंडल के लिए खास आकर्षण रही। इसके अलावा इटली की प्रसिद्ध ‘वेल्ड रेबेका’ मूर्ति समेत कई दुर्लभ कलाकृतियां भी है।
संग्रहालय के अधिकारियों ने प्रतिनिधिमंडल को इसकी स्थापना और विकास की जानकारी देते हुए बताया कि इसका प्रमुख संग्रह सालारजंग प्रथम नवाब मीर यूसुफ अली खान के निजी संग्रह से जुड़ा है। वर्ष 1949 में उनके निधन के बाद परिवार के सदस्यों और सरकार के बीच हुए समझौते के बाद इस विशाल संग्रह को संरक्षित करने के लिए संग्रहालय की स्थापना की दिशा में कदम उठाया गया।
वर्ष 1951 में संग्रहालय की शुरुआत दीवान देवड़ी स्थित सालारजंग के महल में की गई थी। बाद में संग्रह को स्थायी और व्यवस्थित रूप से संरक्षित करने के लिए वर्तमान परिसर में संग्रहालय भवन का निर्माण कराया गया। वर्ष 1961 में इसे आम जनता के लिए खोलने के साथ ही दीवान देवड़ी से संग्रह को वर्तमान परिसर में स्थानांतरित किया गया।
समय के साथ संग्रहालय का चरणबद्ध विस्तार किया गया और पूर्वी एवं पश्चिमी ब्लॉक के साथ केंद्रीय ब्लॉक समेत विभिन्न हिस्सों का निर्माण किया गया। इसके साथ ही संग्रहालय में देश-विदेश की कला एवं सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह भी लगातार समृद्ध हुआ।
प्रतिनिधिमंडल ने संग्रहालय की विभिन्न दीर्घाओं का भ्रमण कर कलाकृतियों और ऐतिहासिक वस्तुओं को देखा। पत्रकारों ने संग्रहालय अधिकारियों से दुर्लभ विरासत के संरक्षण, संग्रह के विस्तार, और इस सांस्कृतिक विरासत को समझा।

