नेपाल में मीडिया संस्थानों पर पुलिस छापा का राजनीतिक दलो ने की आलोचना

नेपाल में मीडिया संस्थानों पर पुलिस छापा का राजनीतिक दलो ने की आलोचना
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काठमांडू। नेपाल में शुक्रवार देररात मीडिया संस्थानों पर पुलिस की कार्रवाई और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं ने राजशाही शासन के दौरान प्रेस पर हुए दमन की यादें ताजा कर दी हैं।

सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने सरकार की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है। वहीं, इन घटनाओं ने सवाल खड़े किए हैं कि क्या पार्टी का सरकार पर नियंत्रण खत्म हो गया है या फिर ये कार्रवाई उसकी जानकारी में की गई है।

शुक्रवार को पुलिस ने कई मीडिया संस्थानों के न्यूज़रूम में प्रवेश कर पत्रकारों को हिरासत में लिया। आलोचकों का कहना है कि यह कदम संविधान में दी गई पूर्ण प्रेस स्वतंत्रता की गारंटी के विपरीत है। साइबर ब्यूरो और अपराध जांच कार्यालय से तैनात सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने कई पत्रकारों को हिरासत में लिया, जबकि कुछ अन्य पत्रकारों की तलाश भी की जा रही थी। मीडिया प्रतिनिधियों के अनुसार, पत्रकारों को हिरासत में लेने के लिए पुलिस की असामान्य गतिविधियां शुरू होने के बाद कुछ पत्रकारों से संपर्क नहीं हो पा रहा था।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि उसे इन कार्रवाई की पहले से कोई जानकारी नहीं थी। हालांकि, प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के करीबी सूत्रों का दावा है कि यह पहल पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) दान बहादुर कार्की की ओर से की गई थी। आरोप है कि कार्की ने उन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया, जिन्होंने उनके खिलाफ आलोचनात्मक खबरें प्रकाशित की थीं।

हालांकि, पुलिस सूत्रों का कहना है कि आईजीपी ने प्रधानमंत्री की टीम के सदस्यों के साथ समन्वय करने के बाद अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश दिए थे। कथित योजना में पत्रकारों को हिरासत में लेना, उनके उपकरण जब्त करना और समाचारों के स्रोतों की पहचान करना शामिल था।

आईजीपी ने अधिकारियों को निर्देश देते समय स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के निर्देशों का हवाला दिया था। यह जानकारी भी सामने आई है कि उन्होंने प्रधानमंत्री सचिवालय के प्रभावशाली सदस्यों के साथ समन्वय कर निशाना बनाए जाने वाले मीडिया संस्थानों और पत्रकारों की सूची तैयार की थी।

हालांकि, इन कार्रवाइयों का नेतृत्व आईजीपी करते दिखे, लेकिन सूत्रों का कहना है कि सरकार चलाने में सक्रिय कुछ अन्य व्यक्तियों को भी इस प्रक्रिया की जानकारी थी और वे इसमें शामिल थे।

दूसरी ओर, पुलिस की कार्रवाई तेज होने के बाद सत्तारूढ़ आरएसपी ने सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए बयान जारी किया। पार्टी ने कहा कि स्वतंत्र प्रेस को डराने, मीडिया संस्थानों की गरिमा को कमजोर करने और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अंकुश लगाने के लिए कानून प्रवर्तन की आड़ लेना लोकतांत्रिक आचरण के अनुरूप नहीं है।

आरएसपी प्रवक्ता और पूर्व संचार मंत्री जगदीश खरेल ने शुक्रवार देर रात जारी बयान में कहा कि जब मीडिया को नियंत्रित करने के लिए अधिकृत संस्थाएं पहले से ही काम कर रही हैं, तब स्थापित कानूनी और संस्थागत प्रक्रियाओं को दरकिनार कर पत्रकारों को हिरासत में लेना कानून के शासन का खुला उल्लंघन है। इसे किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने आगे कहा कि किसी भी बहाने मीडिया संस्थानों को डराने, उन पर मानसिक दबाव डालने या उनकी गतिविधियों को सीमित करने के प्रयास स्वीकार्य नहीं हैं। खबरें लिखने के कारण कुछ पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और अन्य की तलाश किए जाने की खबरों के मद्देनजर हम संबंधित अधिकारियों से निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्यपरक जांच करने, बिना देरी सच्चाई सार्वजनिक करने और गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखे गए पत्रकारों को तत्काल, सम्मानपूर्वक और बिना किसी शर्त के रिहा करने का आग्रह करते हैं।

पूर्व मंत्री ने मीडिया क्षेत्र के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए उनसे भय, धमकी और अनुचित दबाव के आगे झुके बिना साहस, सच्चाई, तथ्यों और ईमानदारी के प्रति प्रतिबद्धता के साथ पत्रकारिता जारी रखने का आग्रह किया।

इस बीच, प्रधानमंत्री कार्यालय ने शुक्रवार की कार्रवाई से किसी भी तरह की जिम्मेदारी होने से इनकार किया है। इस घटना ने सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के बीच तनाव को उजागर कर दिया है। इसने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है कि क्या वरिष्ठ पार्टी नेता के नेतृत्व में मंत्रिमंडल गठित होने के बावजूद आरएसपी नेतृत्व का सरकार पर नियंत्रण खत्म हो गया है?

पुलिस की इस कार्रवाई की वकीलों और मीडिया अधिकारों के लिए काम करने वाले लोगों ने आलोचना की है। मुख्य विपक्षी नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी इस कार्रवाई की निंदा की है।

नेपाल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय प्रसाद मिश्र ने कहा, “यह घटना राजशाही शासन की याद दिलाती है। सरकार के लिए खुद इस तरह के दमनकारी कृत्यों में शामिल होना उचित नहीं है।” उन्होंने कहा, “दुनिया में कहीं भी ऐसा उदाहरण नहीं है कि पत्रकारों को गिरफ्तार और प्रताड़ित करके कोई सरकार सफल हुई हो। यह अच्छा संकेत नहीं है।”

नेपाल बार एसोसिएशन के पूर्व उपाध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता टीकाराम भट्टराई ने मीडिया संस्थानों पर छापों को राजा ज्ञानेन्द्र के शासनकाल के दमन से भी आगे की घटना बताया। भट्टराई ने फेसबुक पर लिखा, “यह घटना असंवैधानिक है, संवैधानिक सर्वोच्चता और कानून के शासन के विपरीत है तथा लोकतंत्र को कमजोर करने के कारण निंदनीय है।” उन्होंने कहा, “गिरफ्तार पत्रकारों की रिहाई मुख्य सवाल नहीं है। हर जागरूक नागरिक को इस तरह की सरकार, उसके आचरण और रवैये के खिलाफ तथा लोकतंत्र की रक्षा में आवाज उठानी चाहिए।

बीते साल एक फरवरी को राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा राज्य की प्रत्यक्ष सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद सशस्त्र सैनिकों को मीडिया संस्थानों में तैनात किया गया था। समाचारों के प्रकाशन और प्रसारण पर सेंसरशिप लागू की गई थी। कुछ मीडिया संस्थानों के उपकरण भी जब्त किए गए थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राजशाही सरकार की कार्रवाइयों के खिलाफ दर्जनों आदेश जारी किए थे। तब से मीडिया पर सरकारी दमन की चर्चा के दौरान राजशाही शासन के आचरण की तुलना अक्सर की जाती रही है।

संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा का हवाला देते हुए नेपाल पत्रकार महासंघ के पूर्व अध्यक्ष शिव गांवले ने कहा कि समाचारों के स्रोतों की पहचान करने के लिए पुलिस का न्यूजरूम में प्रवेश करना संवैधानिक व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त होने के समान है।

गांवले ने कहा, “अगर पुलिस समाचारों के स्रोतों की पहचान करने के नाम पर न्यूज़रूम में घुसकर पत्रकारों को गिरफ्तार करने लगी है, तो इस देश में संविधान प्रभावी रूप से समाप्त हो चुका है। हम प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रख सकते हैं, लेकिन अब सबसे पहले हमें संविधान को बचाने के लिए लड़ना होगा।”

प्रेस काउंसिल नेपाल ने भी प्रकाशित समाचारों को लेकर पत्रकारों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई की निंदा की है। काउंसिल ने अपने बयान में कहा, “पुलिस मुख्यालय की ओर से जारी बयान की पृष्ठभूमि में यह घटना प्रेस स्वतंत्रता और पत्रकारों की पेशेवर सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।” काउंसिल ने सरकार, पुलिस प्रशासन और अन्य संबंधित पक्षों से आग्रह किया कि समाचारों को लेकर होने वाले विवादों का समाधान पुलिस तैनात करने के बजाय परिषद की स्थापित प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव रमन कर्ण ने पुलिस की कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास बताया। कर्ण ने कहा, “जब सरकार पुलिस का इस्तेमाल करके इस तरह की कार्रवाई करती है, तो यह संविधान को कमजोर करने के समान है। यदि तथ्यों को सामने लाने के लिए पत्रकारों को छापों और हिरासत का सामना करना पड़े, तो देश में कानून के शासन का क्या अर्थ रह जाता है? यह निरंकुश आचरण की पराकाष्ठा है।”

anand prakash

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