महंगाई की मार से सिकुड़े मिट्टी के दीये,कुम्हारों की आजीविका पर संकट
-चाइनीज झालरों के बीच परंपरा की लौ बरकरार,मिट्टी से लेकर ईंधन तक महंगा, लागत बढ़ी,मुनाफा घटा
मोतिहारी/सुगौली। दीपावली और छठ पर्व पर घर-आंगन को रोशन करने वाले मिट्टी के दीये इस बार महंगाई की मार झेल रहे हैं।मिट्टी से लेकर दीये पकाने में इस्तेमाल होने वाले कंडे और लकड़ियों तक की कीमत बढ़ने से कुम्हारों का पारंपरिक कारोबार मुश्किलों में घिर गया है।
हालात ऐसे हैं कि कभी बड़े और आकर्षक दीये बनाने वाले कुम्हार अब लागत कम करने के लिए छोटे आकार के दीये बनाने को मजबूर हैं।चाइनीज झालरों और आधुनिक सजावटी लाइटों के बढ़ते चलन के बावजूद मिट्टी के दीयों की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है,लेकिन बढ़ती महंगाई ने कुम्हारों की कमाई पर गहरा असर डाला है।
बंजरिया और सुगौली के कुम्हार बुधन पंडित विक्रम पंडित और उमेश पंडित बताते हैं कि पहले एक ट्रैक्टर मिट्टी पांच सौ से एक हजार रुपये में मिल जाती थी,लेकिन अब इसके लिए तीन से चार हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।मिट्टी की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी ने दीये और मिट्टी के अन्य बर्तन बनाने की लागत बढ़ा दी है।
इसके अलावा बर्तनों को पकाने के लिए जरूरी कंडे और लकड़ियां भी महंगी हो गई हैं।ऐसे में लागत बढ़ने के बावजूद कुम्हार ग्राहकों से मनमाना दाम नहीं वसूल सकते।ग्राहक सीमित कीमत में दीये चाहते हैं,जबकि कुम्हारों के सामने लागत निकालने की चुनौती है।इसी संतुलन को साधने के लिए अब छोटे आकार के दीये तैयार किए जा रहे हैं।
कुम्हारों के चाक पर मिट्टी आज भी घूम रही है और दीपावली की तैयारी में हर दिन सैकड़ों दीये आकार ले रहे हैं।दीपावली से करीब एक महीने पहले ही कुम्हार परिवार काम में जुट जाते हैं,ताकि त्योहार के दौरान बाजार की मांग पूरी की जा सके।मिट्टी की सोंधी खुशबू और दीये की लौ से जुड़ी परंपरा आज भी लोगों को आकर्षित करती है,लेकिन सवाल यह है कि बढ़ती लागत और सीमित कमाई के बीच आखिर कुम्हार अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करें?
कुम्हारों की परेशानी केवल महंगी मिट्टी तक सीमित नहीं है।मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए खुले और बड़े मैदान की जरूरत होती है,जहां तैयार बर्तनों को धूप में सुखाया जा सके।लेकिन मोहल्लों में जगह की कमी के कारण अब घर के अंदर बर्तन बनाने और दरवाजे पर सुखाने की मजबूरी है।इससे मेहनत और समय दोनों बढ़ जाते हैं।जगह की कमी,ईंधन की महंगाई और बाजार में बदलती पसंद ने इस पारंपरिक कारोबार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
उल्लेखनीय है,कि आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के कारण मिट्टी के कई पारंपरिक बर्तन अब चलन से बाहर हो चुके हैं।साल के अधिकांश महीनों में पर्याप्त काम नहीं मिलने से कुम्हार परिवारों की आमदनी भी प्रभावित होती है।दीपावली और छठ जैसे त्योहारों के दौरान ही कारोबार में कुछ तेजी आती है।त्योहार समाप्त होने के बाद रोजगार की तलाश में उन्हें दूसरे स्थानों का रुख करना पड़ता है।
इसके बावजूद मिट्टी के दीयों की लौ बुझी नहीं है।चाइनीज झालरों की चमक के बीच भी लोग पूजा-पाठ और परंपरा के लिए मिट्टी के दीये खरीदते हैं।कुम्हार छोटे दीये बनाकर अपनी आजीविका बचाने और सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं।लेकिन सवाल यह है कि जब मिट्टी,ईंधन,मेहनत और समय की कीमत लगातार बढ़ रही है,तो मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगरों की जिंदगी में खुशहाली का उजाला कब आएगा?

