अति भारी तत्वों के अध्ययन में बड़ी सफलता, सीबोर्गियम के बंध की मजबूती मापने में मिली कामयाबी
-शोध में आईआईटी रुड़की का अहम योगदान
रूड़की। जर्मनी के डार्मस्टाट स्थित जीएसआई/फेयर संस्थान के नेतृत्व में हुए अंतरराष्ट्रीय शोध में पहली बार किसी अति भारी तत्व के यौगिक की रासायनिक स्थिरता को मापा गया है।इस शोध में आईआईटी रुड़की ने भी अहम योगदान दिया है। यह शोध प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ है।
आईआईटी रुड़की द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, शोध दल ने तत्व संख्या 106 सीबोर्गियम के हेक्साकार्बोनिल यौगिक एसजी(सीओ)6 पर अध्ययन किया। परिणामों से पता चला कि सीबोर्गियम परमाणु और कार्बन मोनोऑक्साइड के बीच का रासायनिक बंध, आवर्त सारणी में उसकी स्थिति के अनुसार अपेक्षित मजबूती से कमजोर है। इसका मुख्य कारण सापेक्षता का प्रभाव है।
अति भारी तत्व 104 से 118 परमाणु संख्या वाले होते हैं, जिन्हें कण त्वरक में कृत्रिम रूप से बनाया जाता है। इनकी उत्पादन दर रोजाना कुछ परमाणु ही होती है और जीवनकाल आधे सेकंड से भी कम होता है, इसलिए इनका रासायनिक अध्ययन बेहद कठिन है।
जीएसआई/फेयर के डॉ. अलेक्जेंडर याकुशेव ने बताया कि पहली बार हम अति भारी तत्व के यौगिक में बंध की मजबूती मापने में सफल हुए। क्रोमियम से मोलिब्डेनम और फिर टंगस्टन तक बंध की मजबूती बढ़ती है, लेकिन सीबोर्गियम में यह प्रवृत्ति उलट जाती है। उच्च परमाणु संख्या के कारण इलेक्ट्रॉन की संरचना बदल जाती है और बंध कमजोर हो जाता है। हाल की क्वांटम रासायनिक गणनाएं इस प्रभाव की पुष्टि करती हैं।
शोध में आईआईटी रुड़की की प्रो. मौमिता मैती ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मैती के अनुसार अति भारी तत्वों का अध्ययन असाधारण चुनौतियों से भरा है और इसके लिए सटीक तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है। यह सहयोग विभिन्न संस्थानों की विशेषज्ञता को एक साथ लाया है।प्रयोग में सीबोर्गियम-259 के 75 परमाणु दर्ज किए गए, जिनमें से केवल तीन हेक्साकार्बोनिल के रूप में मिले, जबकि टंगस्टन के 17 प्रतिशत परमाणुओं ने यही यौगिक बनाया। इससे सीबोर्गियम के बंध की मजबूती 4 किलो जूल प्रति मोल कम आंकी गई।
शोधकर्ताओं ने बताया कि यह सफलता वैश्विक सहयोग के बिना संभव नहीं थी। अब दल सीबोर्गियम से भी भारी तत्वों पर प्रयोग की तैयारी कर रहा है।

