डॉ. मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में उद्बोधन, ‘संयुक्त राज्य अमेरिका कहने पर बहुलतावाद का बोध और भारत बोलने मात्र से विविधता में एकता का अहसास’

डॉ. मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में उद्बोधन, ‘संयुक्त राज्य अमेरिका कहने पर बहुलतावाद का बोध और भारत बोलने मात्र से विविधता में एकता का अहसास’
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न्यूयॉर्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आज कहा कि भारत के लिए एकता और विविधता-दोनों उसके स्वभाव में ही अन्तर्निहित हैं। संघ प्रमुख ने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाइयां नहीं होते।राष्ट्र एक दायित्व का निर्वाह करते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि प्रत्येक राष्ट्र के पास संसार को देने के लिए एक संदेश, पूर्ण करने के लिए एक ध्येय और साकार करने के लिए एक नियति होती है। उन्होंने यह विचार यहां के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘एहेड फोरम’ के तत्वावधान में आयोजित सार्वभौमिक एकात्मता समारोह में व्यक्त किए।

डॉ. भागवत के उद्बोधन के प्रमुख बिंदु


एक- बहुलतावाद और विविधता में एकता

जब हम संयुक्त राज्य अमेरिका कहते हैं, तब एक शब्द जिसकी प्रायः चर्चा होती है, वह है- “बहुलतावाद” (Pluralism)। और जब हम भारत कहते हैं, तब एक अन्य शब्द, एक अन्य भाव-वाक्य सामने आता है-“विविधता में एकता” (Unity in diversity)। भारत के लिए एकता और विविधता-दोनों उसके स्वभाव में ही अन्तर्निहित हैं।

दो- राष्ट्र का ध्येय और दायित्व

राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाइयां नहीं होते। राष्ट्र एक दायित्व का निर्वाह करते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि प्रत्येक राष्ट्र के पास संसार को देने के लिए एक संदेश, पूर्ण करने के लिए एक ध्येय और साकार करने के लिए एक नियति होती है।

तीन- भारत की नियति

भारत को कौन-सी नियति प्राप्त हुई है? भारत का दायित्व है कि वह विविधता में एकता के इस सत्य का साक्षात्कार करे और समय-समय पर संसार को भी इस सत्य का साक्षात्कार कराए। हम एक हैं और विविधता के कारण हमारी यह एकता और भी सुशोभित होती है। अतः विविधता का उत्सव मनाया जाना चाहिए, उसका सम्मान किया जाना चाहिए और उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। साथ ही, हमें अपने भीतर एकात्मता के इस भाव को सदैव बनाए रखना चाहिए।चार- मानव का वैश्विक दायित्व

जो विचारशील मनुष्य उचित और अनुचित का ज्ञान रखते हैं, उनका दायित्व है कि वे सम्पूर्ण विश्व को धारण और संरक्षित रखने में अपना उत्तरदायित्व निभाएं।

पांच- विचार की दिशा

यदि आप सम्यक प्रकार से विचार करते हैं, तो आप ईश्वर के निकट जा सकते हैं। यदि आप अनुचित ढंग से विचार करते हैं, तो आप पशु-जगत के निकट जा सकते हैं। अतः दिशा महत्त्वपूर्ण है।

छह- उत्तरदायी नागरिक

जो व्यक्ति अपने जीवन को उचित दिशा के अनुसार ढालता है, वह ईश्वर के राज्य का उत्तरदायी नागरिक बन जाता है।

सात-मनुष्य की विशिष्टता- विचार

एक ऐसी विशेषता जो मनुष्य को पशुओं से भिन्न बनाती है, वह है-विचार करने की क्षमता। यदि मनुष्य सम्यक विचार करे, तो वह सम्पूर्ण विश्व को धारण कर सकता है।

आठ- उचित-अनुचित का विवेक और एकता

मनुष्य विश्व के प्रति उत्तरदायी है, क्योंकि उसमें उचित और अनुचित का विवेक है। इसलिए मनुष्य विविधता के बावजूद एकता का साक्षात्कार कर सकता है।

नौ- अन्तर्निहित एकत्व

हमारे शरीर भिन्न हैं और बाह्य रूप से सब कुछ अलग दिखाई देता है, फिर भी हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो समान है। हम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हम परस्पर के हैं।

10-अस्तित्व की एकता

“अस्तित्व की एकता” – यही हमारा सत्य है।

11- विश्व दृष्टि

संसार को “एक” देखना हमारी दृष्टि है।

12- दो जीवन-दृष्टियां

एक प्रवृत्ति थी-“जियो और जीने दो।”

दूसरी प्रवृत्ति थी-“जियो और केवल उन्हीं को जीने दो जो हमारी आज्ञा मानें।”

जो कहते हैं-“तुम हमारी आज्ञा मानो और हम तुम्हारी रक्षा करेंगे,” वे राक्षस हैं।13-भारत की संत-परम्परा

भारत के संत-महापुरुष, दुष्ट लोगों के मन से शत्रुता का भाव समाप्त हो जाए, ऐसी प्रार्थना करते हैं।

14-अमेरिका में भारतीय प्रवासी समुदाय का दायित्व

अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासी समुदाय को अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए।

इस अनिवार्य कर्तव्य का निर्वाह करने के पश्चात यदि जन्मभूमि के लिए कुछ करने की उत्कट इच्छा हो, तो उन मूल्यों के अनुरूप जीवन जिएं जो भारत ने आपको प्रदान किए हैं।

15- भारत की विश्व भूमिका

हमारी नियति है कि हम यह संदेश संसार को दें। और जिस दृढ़ आधार पर इस धर्म का बोध होता है, वह है-अस्तित्व की एकात्मता, अस्तित्व की एकता। यही हमारा सत्य है।

16-हिमालय से समुद्र तक एक दायित्व

हिमालय से समुद्र तक हमारा एक ही दायित्व है-इस ज्ञान को संसार तक पहुंचाना।

भारत में हमारा दायित्व है कि हम सत्य का साक्षात्कार करें।

17-भारत की जीवन दृष्टि

भारत ने आपको जीवन की दृष्टि प्रदान की है।

18-उपदेश नहीं, आचरण

एक भारतीय का दायित्व है कि वह इस संदेश को उपदेश द्वारा नहीं, बल्कि आचरण द्वारा संसार तक पहुंचाए।

19- धर्म का अर्थ

धर्म वह नियम है जिसके द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि धारण होती है।

धर्म वह नियम है जिसके द्वारा मनुष्य अपने जीवन की गुणवत्ता को सुव्यवस्थित कर सकता है।

मध्यम मार्ग ही धर्म है।

20-एकात्मता और विविधता

हम एकात्मता में एकजुट हैं और विविधता से सुशोभित हैं।

21- विविधता स्वाभाविक, एकता सत्य

विविधता स्वाभाविक है और एकता सत्य है।

22- ग्रहण और प्रतिदान

हमने संसार से सब कुछ ग्रहण किया है, अतः हमें संसार को लौटाना भी है।

हम कितना अर्जित करते हैं, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है; हम कितना बाँटते हैं, यह महत्त्वपूर्ण है।

23- परम्परा और सतत जीवन पद्धति

हमें लौटाकर देना है। यही हमारी परम्परा है।

भारत आपसे अपेक्षा करता है कि आप उसकी जीवन दृष्टि को आगे बढ़ाएं।

यह सतत जीवन पद्धति का एक आदर्श है।

anand prakash

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